नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं उस गुण की बात करने आया हूँ जिसे संसार अक्सर कमज़ोरी समझ लेता है, पर जो वास्तव में मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है — नम्रता सबसे बड़ा आभूषण है। आभूषण वही होता है जो व्यक्ति के होने को सुंदर बनाए, बोझ न बने। धन, पद, विद्या, शक्ति — ये सब यदि अहंकार से ढक जाएँ, तो मनुष्य को भारी बना देते हैं; पर नम्रता उन्हें प्रकाशमान कर देती है। नम्रता के बिना श्रेष्ठता खोखली है, और नम्रता के साथ साधारणता भी दिव्य हो जाती है।
नम्रता का अर्थ स्वयं को छोटा समझना नहीं है। यह भ्रम अक्सर फैलाया जाता है। नम्रता का अर्थ है — स्वयं को सही स्थान पर समझना। न स्वयं को सबसे ऊपर मानना, न स्वयं को तुच्छ समझना। नम्र व्यक्ति जानता है कि उसमें सामर्थ्य है, पर वह यह भी जानता है कि यह सामर्थ्य केवल उसका नहीं, परिस्थितियों, शिक्षकों, समाज और समय का संयुक्त परिणाम है। यही बोध अहंकार को जन्म लेने से रोक देता है।
जहाँ अहंकार शोर करता है, नम्रता मौन में बोलती है। अहंकार स्वयं को साबित करने की जल्दी में रहता है; नम्रता को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। वह जानती है कि जो सच है, वह चिल्लाए बिना भी दिख जाता है। इसीलिए सच्चा विद्वान शांत होता है, सच्चा साधक विनम्र होता है, और सच्चा शक्तिशाली झुका हुआ होता है। वृक्ष जितना फलदार होता है, उतना ही झुकता है — यह प्रकृति का नियम है, और यही धर्म का संकेत है।
नम्रता मनुष्य को सीखने योग्य बनाए रखती है। जो व्यक्ति यह मान लेता है कि वह सब कुछ जानता है, उसका विकास वहीं रुक जाता है। पर जो नम्र है, वह हर अनुभव से सीख लेता है — सफलता से भी, असफलता से भी; प्रशंसा से भी, आलोचना से भी। नम्रता ज्ञान के द्वार खुले रखती है। और जहाँ सीख चलती रहती है, वहाँ चेतना प्रखर होती जाती है।
नम्रता संबंधों को जीवित रखती है। अहंकार रिश्तों में दूरी पैदा करता है, नम्रता सेतु बनाती है। नम्र व्यक्ति अपनी भूल स्वीकार कर सकता है, क्षमा माँग सकता है, और क्षमा दे भी सकता है। यह सब करने के लिए साहस चाहिए — और यही साहस नम्रता देती है। कठोर व्यक्ति बाहर से मजबूत दिख सकता है, पर भीतर से वह भयभीत होता है; नम्र व्यक्ति भीतर से निडर होता है, इसलिए वह झुक सकता है।
धर्म के मार्ग पर नम्रता इसलिए अनिवार्य है क्योंकि धर्म का उद्देश्य श्रेष्ठ कहलाना नहीं, श्रेष्ठ बनना है। जो व्यक्ति अपने धर्म का ढोल पीटता है, वह नम्र नहीं होता; और जो नम्र होता है, उसे ढोल की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसका आचरण ही उसका परिचय बन जाता है। नम्रता धर्म को सुंदर बनाती है, क्योंकि वह उसे मानवीय रखती है।
नम्रता का एक और गहरा रूप है — कृतज्ञता। जो कृतज्ञ है, वह नम्र होता है; और जो नम्र है, वह कृतज्ञ होता है। कृतज्ञ व्यक्ति जानता है कि जीवन उपहार है, अधिकार नहीं। यह बोध उसे कठोर नहीं होने देता। वह समय, अवसर और लोगों का सम्मान करता है। और जहाँ सम्मान है, वहाँ धर्म सहज रूप से प्रकट होता है।
नम्रता अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। यह स्पष्ट होना चाहिए। नम्र व्यक्ति अन्याय के सामने खड़ा होता है, पर द्वेष के साथ नहीं। वह सत्य के पक्ष में दृढ़ रहता है, पर अहंकार के बिना। यही संतुलन उसे अलग बनाता है। वह लड़ता है, पर भीतर शांति बनाए रखता है। यही आंतरिक शांति नम्रता की पहचान है।
आज के समय में जब हर कोई स्वयं को ऊँचा सिद्ध करने की दौड़ में है, नम्रता दुर्लभ हो गई है। पर दुर्लभ ही मूल्यवान होता है। नम्रता भीड़ से अलग नहीं करती, पर भीड़ में खोने नहीं देती। वह व्यक्ति को स्थिर बनाती है — प्रशंसा में भी, निंदा में भी। और यही स्थिरता धर्म का फल है।
अंततः नम्रता वह आभूषण है जो कभी उतारना नहीं पड़ता। समय के साथ धन घट सकता है, पद बदल सकता है, शरीर ढल सकता है — पर नम्रता और निखरती जाती है। क्योंकि वह बाहर से नहीं, भीतर से आती है।
इसलिए स्मरण रहे —
नम्रता कमजोरी नहीं, परिपक्वता है।
नम्रता झुकना नहीं, संतुलन है।
और नम्रता सबसे बड़ा आभूषण है।
जो इसे धारण कर लेता है, उसे स्वयं को ऊँचा दिखाने की आवश्यकता नहीं रहती — उसका होना ही उसे ऊँचा बना देता है।

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