सनातन संस्कृति में सुनने की साधना
सनातन संस्कृति में सुनना कोई साधारण क्रिया नहीं है। यहाँ सुनना केवल कानों से शब्द ग्रहण करना नहीं, बल्कि चेतना को खोलना है। इसी कारण शास्त्रों में सुनने को साधना कहा गया—क्योंकि यह अहंकार को शिथिल करता है और ज्ञान के लिए भीतर स्थान बनाता है। जहाँ आधुनिक जीवन बोलने, बताने और सिद्ध करने पर बल देता है, वहीं सनातन दृष्टि सिखाती है कि जो सच में जानना चाहता है, उसे पहले सुनना सीखना होगा।
वेदों को “श्रुति” कहा गया—जो सुने गए। यह नामकरण अपने आप में एक गहरा संकेत है। सत्य को लिखा नहीं गया, बताया नहीं गया—उसे सुना गया। ऋषि मौन और एकाग्रता की अवस्था में थे, और उस अवस्था में जो प्रकट हुआ, वही ज्ञान बना। इसका अर्थ यह है कि सत्य सक्रिय शोर में नहीं, गहन श्रवण में उतरता है। इसलिए सनातन संस्कृति में सुनना ज्ञान-प्राप्ति की पहली सीढ़ी है।
उपनिषदों की परंपरा देखिए—गुरु बोलता कम है, शिष्य सुनता अधिक है। और यह सुनना निष्क्रिय नहीं होता। शिष्य अपने भीतर प्रश्न लेकर बैठता है, पर उत्तर को थोपता नहीं। वह प्रतीक्षा करता है। यही प्रतीक्षा सुनने की साधना का मूल है। शास्त्र कहते हैं—जो तुरंत उत्तर चाहता है, वह जानकारी चाहता है; जो धैर्य से सुनता है, वह बोध चाहता है।
सुनने की साधना का पहला चरण है—अहंकार का त्याग। जो व्यक्ति यह मानकर सुनता है कि वह पहले से जानता है, वह वास्तव में सुन ही नहीं पाता। उसके कान खुले होते हैं, पर मन बंद। सनातन संस्कृति में शिष्य का पहला गुण यही माना गया कि वह “न जानने” को स्वीकार करे। यही कारण है कि गुरु के सामने शिष्य बैठता है, खड़ा नहीं—यह बाहरी संकेत है भीतर की विनय का। जहाँ विनय है, वहीं सुनना संभव है।
दूसरा चरण है—मौन। सुनने की साधना बिना मौन के संभव नहीं। यह मौन केवल वाणी का नहीं, भीतर चल रहे विचारों का भी है। जब मन लगातार अपनी प्रतिक्रिया तैयार कर रहा होता है, तब वह सुन नहीं रहा होता। सनातन परंपरा में इसलिए मौन-व्रत, ध्यान और संयम को इतना महत्व दिया गया—ताकि सुनने की क्षमता विकसित हो सके। मौन सुनने का शुद्ध वातावरण है।
तीसरा चरण है—धैर्य। शास्त्र कहते हैं कि गहरा सत्य तुरंत नहीं उतरता। कई बार गुरु एक ही बात बार-बार कहता है, और शिष्य वर्षों तक सुनता रहता है। पर जिस दिन भीतर पात्रता बनती है, उसी दिन वही वाक्य ज्ञान बन जाता है। इसलिए सुनने की साधना समय माँगती है। जो अधीर है, वह केवल शब्द सुनता है; जो धैर्यवान है, वह अर्थ ग्रहण करता है।
इस साधना का सर्वोच्च उदाहरण हमें भगवद्गीता में मिलता है। युद्धभूमि में अर्जुन बोल सकता था, तर्क कर सकता था, बहस कर सकता था—पर उसने पहले सुना। उसने कृष्ण की बात को बीच में काटा नहीं, उसे चुनौती नहीं दी। उसने सुना, मनन किया, और अंत में कहा—“मेरा मोह नष्ट हो गया।” यह परिवर्तन बोलने से नहीं, सुनने से हुआ। और उपदेश देने वाले थे भगवान कृष्ण—जो स्वयं कहते हैं कि ज्ञान उसी को मिलता है, जो श्रद्धा से सुनता है।
सनातन संस्कृति में सुनने की साधना केवल गुरु-वाणी तक सीमित नहीं है। यहाँ जीवन को भी गुरु माना गया है। परिस्थितियाँ, संबंध, सुख-दुःख—सब कुछ कुछ न कुछ कहता है। जो व्यक्ति हर अनुभव में केवल प्रतिक्रिया करता है, वह जीवन की शिक्षा नहीं सुन पाता। और जो ठहरकर देखता, सुनता और समझता है, वही वास्तव में विकसित होता है। इसलिए कहा गया—सुनना केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, जीवन-कौशल भी है।
सुनने की साधना का एक और गहरा पक्ष है—दूसरों को सुनना। सनातन दृष्टि में जो व्यक्ति दूसरों को ध्यान से सुन सकता है, वही करुणा को समझ सकता है। समाज में अधिकांश संघर्ष इसलिए होते हैं, क्योंकि लोग सुनते नहीं, केवल उत्तर देने की प्रतीक्षा करते हैं। शास्त्र कहते हैं—जो सुनना सीख लेता है, वह आधा विवाद वैसे ही समाप्त कर देता है। सुनना अहिंसा का मौन रूप है।
आधुनिक युग में यह साधना और भी दुर्लभ हो गई है। हर कोई बोल रहा है, बहुत कम लोग सुन रहे हैं। सूचना प्रचुर है, पर बोध दुर्लभ। सनातन संस्कृति हमें याद दिलाती है कि ज्ञान की मात्रा बढ़ाने से पहले पात्रता बढ़ानी होती है। और पात्रता सुनने से आती है। जिस पात्र में पहले से शोर भरा हो, उसमें अमृत कैसे उतरेगा?
अंततः सनातन संस्कृति का संदेश अत्यंत सरल और गहन है—
सुनना कमजोरी नहीं, परिपक्वता है।
सुनना पराधीनता नहीं, आंतरिक स्वतंत्रता है।
जहाँ बोलना अहंकार को पुष्ट करता है,
वहीं सुनना अहंकार को पिघलाता है।
और जिस दिन मनुष्य सच में सुनना सीख लेता है,
जिस दिन ज्ञान बाहर से नहीं,
भीतर से बोलने लगता है।
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