विद्या के दुरुपयोग से समाज कैसे पतन की ओर जाता है
सनातन दृष्टि में विद्या को कभी तटस्थ शक्ति नहीं माना गया। विद्या को तेज कहा गया—ऐसा तेज जो प्रकाश भी दे सकता है और यदि संयम से रहित हो जाए तो दाह भी कर सकता है। इसलिए शास्त्रों में विद्या को धर्म से जोड़ा गया, और चेतावनी दी गई कि यदि विद्या विवेक और करुणा से कट जाए, तो वही विद्या समाज के पतन का कारण बन जाती है। यह पतन अचानक नहीं होता; यह धीरे-धीरे, भीतर से शुरू होता है।
शास्त्र बताते हैं कि विद्या का पहला दुरुपयोग तब होता है, जब उसे सेवा से हटाकर सत्ता का साधन बना लिया जाता है। जब ज्ञान का उद्देश्य सत्य की खोज न रहकर नियंत्रण और प्रभुत्व बन जाता है, तब विद्या विकृत होने लगती है। ऐसे में शिक्षित व्यक्ति समाज का पथप्रदर्शक नहीं, शोषक बन जाता है। बुद्धि तर्क गढ़ने लगती है, ताकि अन्याय को भी वैध ठहराया जा सके। यही वह अवस्था है, जहाँ समाज बाहर से व्यवस्थित दिखता है, पर भीतर से सड़ने लगता है।
दूसरा बड़ा दुरुपयोग है—विद्या का अहंकार। शास्त्र कहते हैं कि जो विद्या विनय न दे, वह विद्या नहीं, अज्ञान का सूक्ष्म रूप है। जब ज्ञानी स्वयं को शेष समाज से श्रेष्ठ मानने लगता है, तब संवाद टूटता है। प्रश्न दबाए जाते हैं, आलोचना को विद्रोह कहा जाने लगता है। ऐसी स्थिति में समाज सीखना बंद कर देता है। और जिस समाज में सीख रुक जाए, उसका पतन निश्चित माना गया है—क्योंकि समय बदलता है, पर दृष्टि जड़ हो जाती है।
तीसरा दुरुपयोग है—विद्या को नैतिकता से अलग कर देना। शास्त्रों के अनुसार विद्या का कार्य केवल “कैसे” बताना नहीं, बल्कि “क्यों” भी बताना है। जब विद्या केवल तकनीक बन जाती है और मूल्य पीछे छूट जाते हैं, तब प्रगति विनाश में बदलने लगती है। हथियारों की उन्नति, छलपूर्ण नीतियाँ, और सूक्ष्म शोषण—ये सब उच्च विद्या के बिना संभव नहीं। पर जब यह विद्या धर्महीन हो जाए, तो समाज अपनी ही प्रगति से घायल होने लगता है।
महाभारत इस सत्य को गहराई से दिखाता है। शकुनि अत्यंत बुद्धिमान था। पासे का खेल केवल जुआ नहीं था, वह बुद्धि का दुरुपयोग था। नियमों के भीतर रहकर अधर्म किया गया। यही सबसे खतरनाक अवस्था है—जब विद्या अधर्म को इतना सुचारु बना दे कि वह धर्म जैसा दिखने लगे। परिणाम हम जानते हैं—पूरा वंश, पूरा समाज युद्ध और विनाश की ओर चला गया।
विद्या का चौथा दुरुपयोग है—ज्ञान को व्यापार बना देना। जब विद्या का मूल्य केवल धन से आँका जाने लगे, तब ज्ञान की पवित्रता नष्ट होने लगती है। शिक्षा पात्रता नहीं, भुगतान देखने लगती है। ऐसे समाज में योग्य व्यक्ति पीछे रह जाता है और साधन-संपन्न आगे बढ़ जाता है। यह असंतुलन धीरे-धीरे सामाजिक विघटन में बदलता है—जहाँ विद्या समाज को उठाने के बजाय विभाजित करने लगती है।
पाँचवाँ दुरुपयोग है—विद्या से करुणा का लोप। शास्त्र कहते हैं कि सच्ची विद्या संवेदनशील बनाती है। यदि कोई व्यक्ति अधिक जानकर भी कठोर होता जाए, दूसरों की पीड़ा से असंवेदनशील हो जाए, तो उसकी विद्या विकृत हो चुकी है। ऐसी विद्या निर्णय तो ले सकती है, पर न्याय नहीं कर सकती। और न्याय के बिना समाज केवल व्यवस्था रह जाता है—समुदाय नहीं।
इस पूरे विषय का संतुलित समाधान हमें भगवद्गीता में मिलता है। भगवान कृष्ण विद्या को कर्म, भक्ति और विवेक—तीनों से जोड़ते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञान तभी मुक्त करता है, जब वह अहंकार नहीं, उत्तरदायित्व बढ़ाए। जब विद्या यह सिखाए कि मैं क्या कर सकता हूँ, उसके साथ यह भी सिखाए कि मुझे क्या नहीं करना चाहिए—तभी वह समाज के लिए कल्याणकारी बनती है। शास्त्र यह भी कहते हैं कि विद्या का दुरुपयोग समाज को इसलिए पतन की ओर ले जाता है, क्योंकि वह विश्वास तोड़ देता है।
अंततः सनातन दृष्टि का संदेश अत्यंत स्पष्ट है—
विद्या शक्ति है, और शक्ति का धर्म आवश्यक है।
विद्या दिशा के बिना खतरनाक है,
और धर्म विद्या के बिना अंधा।
जिस समाज में विद्या विवेक के अधीन रहती है,
वह समाज युगों तक स्थिर रहता है।
और जिस समाज में विद्या अहंकार के अधीन हो जाए,
वह समाज बाहर से चमकता है,
पर भीतर से टूटने लगता है।
इसीलिए सनातन परंपरा ने विद्या को केवल जानने का साधन नहीं, जिम्मेदारी का संस्कार माना— ताकि ज्ञान समाज को ऊँचा उठाए, न कि उसी के भार से उसे गिरा दे।
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