'धी' शक्ति: बुद्धि से बोध तक की दिव्य यात्रा
सनातन संस्कृति के सबसे महान और शक्तिशाली मंत्र 'गायत्री मंत्र' के केंद्र में यदि कोई एक शब्द है, तो वह है— 'धी'। “धियो यो नः प्रचोदयात्” (वह परमात्मा हमारी 'धी' को प्रेरित करे)। विचारणीय प्रश्न यह है कि ऋषियों ने ईश्वर से धन, बल, आयु या स्वर्ग क्यों नहीं मांगा? उन्होंने केवल 'धी' की प्रेरणा क्यों मांगी?
वास्तव में, शास्त्रों में वर्णित 'धी' शक्ति वह प्रकाश है जिसके बिना जीवन का मार्ग अंधकारमय है। यह केवल सूचनाओं को याद रखने वाली 'बुद्धि' (Intellect) नहीं है, बल्कि यह वह 'प्रज्ञा' (Wisdom) है जो सत्य और असत्य के बीच अंतर करना सिखाती है।
१. 'धी' का वास्तविक स्वरूप: बुद्धि और प्रज्ञा का मेल
साधारण भाषा में हम बुद्धि को ही सब कुछ मान लेते हैं, पर शास्त्र कहते हैं कि बुद्धि केवल एक उपकरण (Tool) है। बुद्धि तर्क करती है, हिसाब लगाती है और संसार में जीवित रहने के रास्ते खोजती है। लेकिन 'धी' वह शक्ति है जो बुद्धि को 'दिशा' देती है।
- बुद्धि यह बता सकती है कि परमाणु बम कैसे बनाया जाए।
- 'धी' यह बताती है कि उसका प्रयोग मानवता के विनाश के लिए नहीं, कल्याण के लिए होना चाहिए।
२. गायत्री मंत्र और 'धी' का संबंध
जब हम कहते हैं 'धियो यो नः प्रचोदयात्', तो हम ब्रह्मांडीय चेतना से प्रार्थना कर रहे होते हैं कि हमारी बुद्धि 'कुतर्क' के अंधेरे से निकलकर 'विवेक' के प्रकाश में आए। सनातन परंपरा में माना गया है कि मनुष्य के पास दो विकल्प होते हैं— प्रेय (जो प्यारा लगे) और श्रेय (जो कल्याणकारी हो)। अक्सर हमारी साधारण बुद्धि 'प्रेय' की ओर भागती है, लेकिन जिसकी 'धी' शक्ति जाग्रत हो जाती है, वह 'श्रेय' को चुनता है।
३. 'धी' शक्ति के तीन मुख्य स्तंभ
- निश्चयात्मकता (Decision Making): जीवन के संघर्षों में जब मनुष्य भ्रमित होता है, तब 'धी' उसे स्पष्टता देती है।
- विवेक (Discrimination): 'धी' शक्ति हमें यह बोध कराती है कि क्या नित्य (स्थायी) है और क्या अनित्य (क्षणिक)।
- धारण शक्ति (Retention): श्रेष्ठ संस्कारों और ऊंचे विचारों को मन में थामे रखना 'धी' का ही कार्य है। इसके बिना ज्ञान टिकता नहीं।
४. 'धी' का तप और शुद्धिकरण
'धी' शक्ति हर मनुष्य के भीतर सुप्त अवस्था में होती है, लेकिन यह मलीन हो सकती है। कुसंगति और नकारात्मक विचार इसे ढक देते हैं। स्वाध्याय, ध्यान और सत्य भाषण से 'धी' को माँजा जाता है। जब 'धी' शुद्ध होती है, तो मनुष्य की अंतर्दृष्टि (Intuition) जाग जाती है। वह उन सच्चाइयों को देख पाता है जो आँखों से ओझल हैं।
५. आधुनिक संकट और 'धी' की आवश्यकता
आज के युग में हमारे पास 'Information' बहुत है, लेकिन 'Insight' की कमी है। हम चाँद पर पहुँच गए हैं, लेकिन अपने पड़ोसी के दुख को नहीं समझ पाते। तर्क जब 'धी' से कट जाता है, तो वह 'कुतर्क' बन जाता है। आज की शिक्षा प्रणाली बुद्धि को तेज तो कर रही है, पर 'धी' को परिष्कृत नहीं कर रही। 'धी' हृदय और मस्तिष्क के बीच का वह सेतु है जो मनुष्य को संतुलित रखता है।
६. शास्त्रों का संदेश: 'धी' ही परम ऐश्वर्य है
बिना 'धी' के, आध्यात्मिक ज्ञान भी अहंकार का कारण बन सकता है। 'धी' शक्ति हमें विनम्र बनाती है। यह हमें यह बोध कराती है कि "मैं शरीर नहीं, मैं वह अनंत चेतना हूँ।" यह वह आंतरिक प्रकाश है जो जीवन की आपाधापी में हमें 'स्थिर' रखता है। यदि हमारी 'धी' सुरक्षित है, तो हमारा धर्म, हमारा चरित्र और हमारा भविष्य सुरक्षित है।
निष्कर्षतः, जिस प्रकार एक दीपक पूरे कमरे के अंधेरे को दूर कर देता है, उसी प्रकार जाग्रत 'धी' शक्ति मनुष्य के भीतर के अज्ञान को मिटाकर उसे 'ऋषि' बना देती है। इसीलिए, हर सनातनी का परम लक्ष्य अपनी 'धी' को परमात्मा की ओर मोड़ना होना चाहिए। “शुभं भवतु— श्रेष्ठ बुद्धि ही श्रेष्ठ जीवन का आधार है।”
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें