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जीवन में भ्रम (माया) की पहचान: सत्य और आभास के बीच का सूक्ष्म भेद

जीवन में भ्रम (माया) की पहचान: सत्य और आभास के बीच का सूक्ष्म भेद

जीवन में भ्रम (माया) की पहचान: सत्य और आभास के बीच का सूक्ष्म भेद

Understanding Maya Sanatan Philosophy

सनातन दर्शन के महासागर में 'माया' एक ऐसा शब्द है जिसने हज़ारों वर्षों से जिज्ञासुओं, ऋषियों और वैज्ञानिकों को सोचने पर विवश किया है। आदि शंकराचार्य ने कहा— "ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या"। इसका अर्थ यह नहीं कि संसार का अस्तित्व ही नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि हम संसार को जिस रूप में देख रहे हैं, वह सत्य नहीं है। वह एक 'आभास' है।

माया को समझना 'स्वयं' को समझने की पहली शर्त है। जब तक हम यह नहीं जानेंगे कि 'झूठ' क्या है, तब तक हम 'सत्य' की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ा पाएंगे। आइए, इस विस्तारवादी लेख में माया की परतों को खोलते हैं और इसे पहचानने के व्यावहारिक सूत्रों पर चर्चा करते हैं।

१. माया का शाब्दिक और दार्शनिक अर्थ

'माया' शब्द 'मा' धातु से बना है, जिसका अर्थ है— 'मापना' (To measure)। जो अनन्त को सीमाओं में बाँध दे, जो असीम परमात्मा को 'आकार' और 'नाम' में सीमित कर दे, वही माया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो जिसे हम 'पदार्थ' (Matter) समझते हैं, वह वास्तव में ऊर्जा के परमाणुओं का एक तीव्र नृत्य है। लेकिन हमारी आँखें उसे एक ठोस दीवार या एक स्थिर कुर्सी के रूप में देखती हैं। यही माया का प्राथमिक स्तर है— इंद्रियों का धोखा।

२. माया की पहचान कैसे करें? (पाँच प्रमुख लक्षण)

माया बहुत चतुर है; वह कभी सामने से वार नहीं करती, वह सत्य का चोला पहनकर आती है। उसे पहचानने के लिए हमें अपने भीतर एक 'अध्यात्मिक राडार' विकसित करना होगा।

(A) "जो बदल रहा है, वह सत्य नहीं है"

सनातन धर्म में सत्य की परिभाषा अत्यंत सरल है— "त्रिकालाबाधितं सत्यम्" (जो तीनों कालों—भूत, भविष्य और वर्तमान में न बदले, वही सत्य है)।

  • पहचान: अपने जीवन की किसी भी परिस्थिति को देखें। आपका बचपन बदल गया, आपकी युवावस्था बदल रही है।
  • भ्रम: यदि आप इन बदलते हुए भावों या शरीर को 'अपना वास्तविक स्वरूप' मान लेते हैं, तो आप माया के प्रभाव में हैं।

(B) "सुख की मृगतृष्णा"

रेगिस्तान में धूप के कारण रेत पर पानी का आभास होता है, जिसे मृगतृष्णा कहते हैं। प्यासा हिरण पानी समझकर दौड़ता है और अंत में प्यासा ही मर जाता है।

  • पहचान: संसार के पदार्थ (गाड़ी, बंगला, पद) सुख का 'साधन' तो हो सकते हैं, लेकिन 'स्रोत' नहीं।
  • भ्रम: माया हमें यह समझाती है कि "अगली उपलब्धि मुझे पूर्ण कर देगी।" यह 'निरंतर अधूरापन' ही माया की पहचान है।

(C) "दोषारोपण और परनिंदा"

जब हम अपनी समस्याओं का कारण दूसरों को मानने लगते हैं, तो समझ लीजिए माया ने हमारी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया है। माया हमें 'स्व-निरीक्षण' से रोकती है। वह हमें बताती है कि "मैं दुखी हूँ क्योंकि वह व्यक्ति बुरा है।" सत्य यह है कि परिस्थितियाँ केवल निमित्त हैं, दुख हमारे अपने 'राग और द्वेष' से पैदा होता है।

(D) "अधिकार और ममत्व का भाव" (Possessiveness)

जिसे हम 'मेरा' कहते हैं, वह वास्तव में कुछ समय के लिए हमारे पास 'संभालने' के लिए दिया गया है। माया हमें भूलने पर मजबूर कर देती है कि हम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही जाएंगे। जब वस्तु के जाने का भय, वस्तु के होने की खुशी से बड़ा हो जाए, तो समझ लें कि माया ने आपको जकड़ लिया है।

(E) "प्रतिक्रियात्मक जीवन" (Reactive Living)

यदि कोई आपकी प्रशंसा करे और आप फूल जाएं, और कोई गाली दे और आप क्रोधित हो जाएं, तो आपकी डोर किसी और के हाथ में है। माया हमें परिस्थितियों की 'कठपुतली' बना देती है।

३. माया की दो शक्तियाँ: आवरण और विक्षेप

  • आवरण शक्ति: यह वह शक्ति है जो सत्य को 'ढंक' देती है। जैसे बादल सूर्य को ढंक लेते हैं।
  • विक्षेप शक्ति: यह वह शक्ति है जो ढंके हुए सत्य पर 'कुछ और' आरोपित कर देती है। जैसे अंधेरे में रस्सी पर 'सांप' का आरोपण।

४. माया को पहचानने के व्यावहारिक उपाय (Tools for Detection)

माया को पहचानने के लिए ऋषियों ने कुछ विधियाँ बताई हैं: साक्षी भाव (स्वयं के विचारों को एक तीसरे व्यक्ति की तरह देखना), असंगता (संसार में रहें, पर संसार को अपने भीतर न रहने दें), और सत्संग एवं स्वाध्याय जिससे बुद्धि की धार तेज होती है।

५. माया: शत्रु या शिक्षक?

अक्सर लोग माया को एक 'विलेन' की तरह देखते हैं, लेकिन सनातन दृष्टि बड़ी व्यापक है। माया ईश्वर की ही शक्ति है। वह हमें भटकाती है ताकि हम खोजना सीखें; वह हमें दुख देती है ताकि हम शाश्वत सुख की तलाश करें। जिस दिन बालक खिलौने फेंककर माँ के लिए रोता है, माँ खुद आकर उसे गोद में उठा लेती है। यही माया का रहस्य है।

६. निष्कर्ष: माया के पार का जीवन

जीवन में भ्रम की पहचान का अर्थ संसार को छोड़ देना नहीं है। इसका अर्थ है— संसार में रहते हुए भी 'जागृत' रहना। जिस क्षण आप यह पहचान लेते हैं कि "यह क्रोध मैं नहीं हूँ," उसी क्षण माया का जादू टूट जाता है। माया की पहचान ही मुक्ति का द्वार है। जिसने भ्रम को भ्रम जान लिया, वह सत्य के प्रकाश में खड़ा हो गया।

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