सनातन धर्म में मौन को ज्ञान का द्वार क्यों माना गया
सनातन धर्म में मौन को शब्दों की अनुपस्थिति नहीं माना गया, बल्कि शब्दों के पार जाने की अवस्था कहा गया है। यहाँ ज्ञान को केवल बोला हुआ सत्य नहीं माना गया, बल्कि अनुभूत सत्य माना गया है। और अनुभूति वहाँ होती है, जहाँ वाणी थमती है और चेतना बोलने लगती है। इसी कारण शास्त्रों में कहा गया कि मौन कोई खालीपन नहीं है—मौन वह गर्भ है, जहाँ ज्ञान जन्म लेता है।
सनातन दृष्टि में समस्या यह नहीं है कि मनुष्य कम जानता है, समस्या यह है कि वह बहुत बोलता है—भीतर भी, बाहर भी। विचारों का शोर इतना अधिक होता है कि सत्य की सूक्ष्म आवाज़ दब जाती है। मौन इस शोर को शांत करता है। जब बाहरी और भीतरी दोनों प्रकार की वाणी शांत होती हैं, तभी वह सूक्ष्म बोध प्रकट होता है, जिसे शास्त्र ज्ञान कहते हैं। इसलिए मौन को ज्ञान का द्वार कहा गया—क्योंकि वह प्रवेश कराता है, घोषणा नहीं करता।
उपनिषदों में बार-बार यह संकेत मिलता है कि परम सत्य को शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। शब्द सीमित हैं, और सत्य असीम। इसीलिए गुरु कई बार उत्तर नहीं देता—वह मौन रहता है। इस मौन का सजीव प्रतीक है दक्षिणामूर्ति। शास्त्रों में कहा गया है कि उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश मौन से दिया। यह कथा कहती है कि अंतिम सत्य बोलकर नहीं दिया जा सकता, उसे जगाया जाता है। और यह जागरण मौन में होता है।
सनातन धर्म में मौन को इसलिए भी महत्त्व दिया गया, क्योंकि वाणी मन का विस्तार है। मौन वाणी को रोकता नहीं, मन को साधता है। जब मन शांत होता है, तब विचार स्पष्ट होते हैं, और स्पष्ट विचार ही विवेक को जन्म देते हैं। ऋषि-मुनि मौन-व्रत को साधना का अनिवार्य अंग मानते थे—यह आत्म-नियंत्रण की प्रक्रिया थी, आत्म-दमन नहीं।
मौन और ज्ञान का संबंध मनोवैज्ञानिक भी है। जब व्यक्ति बोलना कम करता है, तो सुनना सीखता है—दूसरों को भी, और स्वयं को भी। आज मनुष्य बाहर की आवाज़ों से इतना घिरा है कि वह अपने भीतर की आवाज़ सुन ही नहीं पाता। मौन उस भीतर की आवाज़ को स्थान देता है। और वही आवाज़ अक्सर विवेक की होती है। इसीलिए मौन को ज्ञान का द्वार कहा गया—क्योंकि वह विवेक को जाग्रत करता है।
सनातन परंपरा में मौन को पलायन नहीं माना गया। मौन जीवन से भागना नहीं, जीवन को गहराई से देखना है। ऋषि वन में मौन इसलिए नहीं रहते थे कि उन्हें समाज से घृणा थी, बल्कि इसलिए कि वे समाज को सही दृष्टि देना चाहते थे। मौन में पकी हुई दृष्टि ही समाज को दिशा दे सकती है। शोर में जन्मे विचार अक्सर अधूरे होते हैं।
गीता में भगवान कृष्ण भी यही संकेत देते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति कम बोलता है, पर जब बोलता है तो उसके शब्द वजन रखते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसके शब्द मौन से जन्मे होते हैं। जो शब्द मौन से निकलते हैं, वे केवल ध्वनि नहीं होते—वे अनुभव होते हैं। इसलिए वे दूसरों के भीतर भी कुछ जगा देते हैं।
आज के युग में, जहाँ हर व्यक्ति अपनी बात तुरंत कहना चाहता है, मौन की यह शिक्षा और भी प्रासंगिक हो जाती है। प्रतिक्रिया के युग में मौन विवेक को बचाता है। विवाद के युग में मौन समझ को गहरा करता है। और सूचना के शोर में मौन ज्ञान को जन्म देता है। यह मौन कमजोरी नहीं, आंतरिक शक्ति का संकेत है।
अंततः सनातन धर्म का संदेश सरल और गहन है— ज्ञान बोलने से नहीं, ठहरने से आता है। सत्य शोर में नहीं, शांति में प्रकट होता है। मौन कोई रिक्तता नहीं, वह वह द्वार है, जिससे होकर मनुष्य शब्दों के संसार से बोध के आकाश में प्रवेश करता है। इसीलिए सनातन परंपरा में मौन को ज्ञान का द्वार कहा गया।
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