गुरु कृपा से भाग्य परिवर्तन की प्राचीन कथाएँ
सनातन धर्म में भाग्य को कभी स्थिर नहीं माना गया। यहाँ भाग्य को पत्थर की लकीर नहीं, बल्कि चेतना की दिशा कहा गया है। और इस दिशा को बदलने वाली सबसे महान शक्ति मानी गई है—गुरु कृपा। शास्त्रों में यह स्पष्ट कहा गया है कि पुरुषार्थ से प्रयास होता है, तप से पात्रता आती है, पर जब गुरु की कृपा जुड़ जाती है, तब वही पात्रता भाग्य का रूप ले लेती है। इसीलिए प्राचीन कथाओं में बार-बार यह सत्य प्रकट होता है कि गुरु की एक दृष्टि, एक वाक्य, या एक मौन भी जीवन की पूरी दिशा बदल सकता है।
सबसे पहले स्मरण आती है उस डाकू की कथा, जो आगे चलकर महर्षि बना। यह कथा बताती है कि गुरु कृपा अपराधी को भी ऋषि बना सकती है। नारद मुनि का सान्निध्य मिलने से पहले वाल्मीकि एक हिंसक जीवन जी रहा था। वह अपने कर्मों को सही ठहराता था, पर सत्य देखने का साहस उसमें नहीं था। नारद ने उसे न शास्त्र सुनाए, न उपदेश दिए—केवल एक प्रश्न किया। वही प्रश्न उसके जीवन का यज्ञ बन गया। नारद के निर्देश पर जब उसने नाम-जप आरंभ किया, तो वही जप उसकी तपस्या बन गया। कालांतर में वही व्यक्ति महर्षि वाल्मीकि कहलाया, जिसने रामकथा को लोककल्याण का साधन बना दिया। यहाँ भाग्य परिवर्तन किसी वरदान से नहीं, गुरु कृपा से हुआ—जिसने चेतना को झकझोर दिया।
गुरु कृपा की दूसरी अत्यंत मार्मिक कथा सुदामा की है। सुदामा निर्धन थे, पर दीन नहीं। वे विद्या में समृद्ध थे, पर सांसारिक वैभव से दूर। जब वे अपने बालसखा और गुरु-भाई भगवान कृष्ण के पास पहुँचे, तो उनके पास देने को केवल मुट्ठी भर चावल थे। कृष्ण ने उन चावलों को राजसी वैभव से भी अधिक मूल्य दिया। यह केवल मित्रता नहीं थी, यह गुरु कृपा का विस्तार था। कृष्ण और सुदामा दोनों ने एक ही गुरु के आश्रम में शिक्षा पाई थी—और वही गुरु-संस्कार सुदामा के जीवन का आधार था। कृष्ण ने सुदामा से कुछ माँगा नहीं, पर जाते समय उसका भाग्य बदल दिया। यहाँ गुरु कृपा अप्रत्यक्ष है—गुरु के दिए संस्कार ही ऐसे थे कि शिष्य का जीवन किसी भी परिस्थिति में गिरा नहीं, और अंततः उसका भाग्य स्वयं चलकर बदल गया।
ऐसी ही एक कथा आती है सांदीपनि मुनि के आश्रम से, जहाँ कृष्ण और बलराम ने शिक्षा प्राप्त की। गुरु दक्षिणा में सांदीपनि मुनि ने अपने मृत पुत्र को वापस लाने की इच्छा व्यक्त की। यह कोई साधारण दक्षिणा नहीं थी—यह गुरु के प्रति शिष्य की पूर्ण समर्पण-भावना की परीक्षा थी। कृष्ण ने गुरु के वचन को असंभव मानकर नहीं छोड़ा, बल्कि उसे धर्म मानकर स्वीकार किया। यही कारण है कि शास्त्र कहते हैं—जिस शिष्य में गुरु के वचन के प्रति संशय नहीं होता, उसका भाग्य स्वयं झुक जाता है। यहाँ गुरु कृपा केवल शिष्य पर नहीं, शिष्य के माध्यम से सृष्टि पर बरसी।
महाभारत में अर्जुन का जीवन भी गुरु कृपा से बदला हुआ जीवन है। अर्जुन महान धनुर्धर थे, पर युद्धभूमि में उनका मन टूट गया था। वहीं भगवान कृष्ण गुरु रूप में प्रकट हुए। कृष्ण ने अर्जुन का भाग्य किसी चमत्कार से नहीं बदला, बल्कि उसकी दृष्टि बदल दी। अर्जुन वही रहा, परिस्थितियाँ वही रहीं, युद्ध वही था—पर दृष्टि बदलते ही भाग्य बदल गया। शास्त्रों में यही कहा गया है कि गुरु कृपा परिस्थितियाँ नहीं बदलती, वह दृष्टि बदल देती है। और दृष्टि बदलते ही कर्म बदलता है, और कर्म बदलते ही भाग्य।
प्राचीन कथाओं में एक और गहन उदाहरण एकलव्य का है। यद्यपि उसे प्रत्यक्ष गुरु-कृपा नहीं मिली, पर उसके भीतर गुरु के प्रति श्रद्धा इतनी प्रबल थी कि उसने गुरु को अपने हृदय में स्थापित कर लिया। शास्त्र इस कथा के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि गुरु कृपा केवल देह से नहीं, भाव से भी प्राप्त होती है। जहाँ भाव शुद्ध है, वहाँ ज्ञान टिकता है। और जहाँ ज्ञान टिकता है, वहाँ भाग्य स्वयं मार्ग छोड़ देता है।
उपनिषदों में बार-बार यह कहा गया है कि गुरु कृपा के बिना आत्मज्ञान संभव नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु कोई चमत्कार करने वाला व्यक्ति है, बल्कि यह कि गुरु वह है जो शिष्य को उसकी ही सामर्थ्य से परिचित करा दे। जैसे सूर्य बाहर से प्रकाश नहीं देता, वह केवल अंधकार हटाता है—वैसे ही गुरु कृपा भाग्य नहीं देती, वह भाग्य के ऊपर पड़ा अज्ञान हटा देती है।
इन सभी कथाओं में एक समान सूत्र दिखाई देता है—गुरु कृपा वहाँ फलित होती है, जहाँ अहंकार नहीं होता। वाल्मीकि ने स्वयं को सही नहीं ठहराया, सुदामा ने अपनी गरीबी को दोष नहीं बनाया, अर्जुन ने अपने मोह को छुपाया नहीं। शिष्य का यह भाव ही गुरु कृपा को आकर्षित करता है। शास्त्र कहते हैं—कृपा माँगी नहीं जाती, वह पात्रता देखकर स्वयं उतरती है।
आज के युग में लोग भाग्य बदलने के लिए ग्रह, तंत्र और उपाय खोजते हैं, पर सनातन परंपरा स्पष्ट कहती है कि सबसे बड़ा उपाय है—सही गुरु का सान्निध्य। क्योंकि गुरु वह है जो भीतर के अज्ञान को काट दे। और जब अज्ञान कट जाता है, तब वही जीवन, वही परिस्थितियाँ, वही संसाधन—सब कुछ अर्थपूर्ण हो जाता है।
गुरु कृपा का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि वह दिखती नहीं, पर घटती अवश्य है। कभी किसी शब्द में, कभी किसी मौन में, कभी किसी डाँट में, तो कभी किसी करुणा-भरे दृष्टिपात में। और जब वह घटती है, तब शिष्य को यह भी ज्ञात नहीं होता कि उसका भाग्य बदल चुका है—वह केवल यह अनुभव करता है कि अब वह पहले जैसा नहीं रहा।
सनातन कथाएँ इसीलिए आज भी जीवित हैं, क्योंकि वे यह भरोसा देती हैं कि चाहे अतीत कितना भी अंधकारमय क्यों न हो, यदि गुरु कृपा मिल जाए, तो भविष्य स्वयं प्रकाश बन जाता है। गुरु कृपा भाग्य को बदलती नहीं— वह मनुष्य को ऐसा बना देती है कि भाग्य को बदलना उसके लिए आवश्यक ही नहीं रह जाता।
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