गुरुकुल शिक्षा प्रणाली: आज के युग में प्रासंगिकता
जब आज की शिक्षा को देखा जाता है, तो वह जानकारी देने में अत्यंत सक्षम दिखाई देती है, पर मनुष्य गढ़ने में कहीं न कहीं कमजोर पड़ जाती है। डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, सुविधाएँ बढ़ रही हैं, तकनीक उन्नत हो रही है, पर भीतर का मनुष्य अधिक अस्थिर, अधिक अकेला और अधिक भ्रमित होता जा रहा है। ऐसे समय में गुरुकुल शिक्षा प्रणाली को केवल अतीत की स्मृति मान लेना एक बड़ी भूल होगी। वास्तव में गुरुकुल कोई पुरानी व्यवस्था नहीं, बल्कि शिक्षा का वह शाश्वत स्वरूप है, जो हर युग में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखता है—बस उसका रूप बदल सकता है, उसका मूल नहीं।
गुरुकुल शिक्षा प्रणाली का आधार था—गुरु के सान्निध्य में जीवन जीकर सीखना। वहाँ शिक्षा कक्षा तक सीमित नहीं थी। शिष्य गुरु के साथ उठता था, बैठता था, सेवा करता था और संवाद करता था। वह केवल विषय नहीं सीखता था, वह आचरण सीखता था। आज की शिक्षा मुख्यतः क्या सोचना है सिखाती है, जबकि गुरुकुल शिक्षा कैसे जीना है सिखाती थी। यही इसका सबसे बड़ा अंतर और सबसे बड़ी शक्ति है।
गुरुकुल में शिक्षा का उद्देश्य नौकरी या प्रतिस्पर्धा नहीं था, बल्कि जीवन के लिए योग्य मनुष्य तैयार करना था। शिष्य को पहले अनुशासन सिखाया जाता था, फिर ज्ञान दिया जाता था। आज हम पहले ज्ञान देते हैं और अनुशासन की आशा बाद में करते हैं—यही उलटाव अनेक समस्याओं की जड़ है। गुरुकुल यह मानकर चलता था कि बिना संयम के दिया गया ज्ञान समाज के लिए भी खतरनाक हो सकता है।
आज के युग में मानसिक तनाव, अवसाद और उद्देश्यहीनता तेजी से बढ़ रही है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि शिक्षा मनुष्य को बाहर की दौड़ के लिए तो तैयार कर देती है, पर भीतर की यात्रा के लिए नहीं। गुरुकुल शिक्षा में ध्यान, मौन, प्रकृति के साथ जीवन और आत्मचिंतन स्वाभाविक रूप से शामिल था। शिष्य वृक्षों, नदियों और आकाश के सान्निध्य में रहता था। इससे उसका मन स्वाभाविक रूप से संतुलित रहता था। आज विज्ञान भी स्वीकार करता है कि प्रकृति के समीप रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है—जो गुरुकुल में सहज रूप से उपलब्ध था।
गुरुकुल शिक्षा की एक और बड़ी विशेषता थी—व्यक्तिगत शिक्षा। वहाँ शिक्षा भीड़ के लिए नहीं, व्यक्ति के लिए होती थी। गुरु शिष्य की प्रवृत्ति, क्षमता और स्वभाव को देखकर उसे मार्गदर्शन देता था। आज की शिक्षा प्रणाली “वन साइज फिट्स ऑल” पर चलती है, जहाँ सभी को एक ही मापदंड में तौला जाता है। परिणामस्वरूप अनेक प्रतिभाएँ दब जाती हैं। गुरुकुल यह स्वीकार करता था कि हर शिष्य अलग है, और उसकी शिक्षा भी अलग होनी चाहिए।
आधुनिक युग में नैतिकता का संकट भी स्पष्ट दिखाई देता है। शिक्षा बहुत है, पर विवेक कम होता जा रहा है। गुरुकुल शिक्षा में नैतिकता अलग से नहीं पढ़ाई जाती थी—वह जीवन में जी जाती थी। गुरु का आचरण ही शिष्य का पाठ्यक्रम होता था। आज नैतिक शिक्षा विषय बन गई है; तब वह वातावरण थी। यही कारण है कि गुरुकुल से निकले लोग केवल विद्वान नहीं, चरित्रवान भी होते थे।
गुरुकुल शिक्षा प्रणाली की प्रासंगिकता आज इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि आज गुरु का स्थान लगभग समाप्त होता जा रहा है। शिक्षक विषय पढ़ाता है, पर जीवन नहीं छूता। गुरुकुल में गुरु केवल शिक्षक नहीं, मार्गदर्शक, संरक्षक और आदर्श होता था। भगवान कृष्ण और अर्जुन का संबंध इसी गुरु-शिष्य परंपरा का आदर्श है—जहाँ गुरु केवल ज्ञान नहीं देता, बल्कि शिष्य को संकट में संभालता भी है। आज के युग में, जहाँ युवा दिशा की तलाश में हैं, ऐसे गुरु-तत्त्व की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।
यह समझना आवश्यक है कि गुरुकुल प्रणाली को आज के समय में ज्यों का त्यों लागू करना संभव नहीं, न ही आवश्यक है। पर उसके मूल सिद्धांत—गुरु के साथ जीवंत संबंध, शिक्षा में नैतिकता, प्रकृति से जुड़ाव, अनुशासन, सेवा और आत्मचिंतन—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। आधुनिक विद्यालय और विश्वविद्यालय यदि इन तत्वों को अपनाएँ, तो शिक्षा केवल करियर का साधन नहीं रहेगी, बल्कि जीवन की तैयारी बनेगी।
आज की शिक्षा अत्यंत प्रतिस्पर्धात्मक हो चुकी है। हर छात्र दूसरे से आगे निकलना चाहता है। गुरुकुल शिक्षा में प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग था। शिष्य एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, सहयात्री होते थे। यह भावना समाज को जोड़ती थी, तोड़ती नहीं थी। आज के विभाजित और तनावग्रस्त समाज में इस सहयोग-बोध की अत्यंत आवश्यकता है।
गुरुकुल शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष था—सेवा। शिष्य गुरु की सेवा करता था, आश्रम के कार्यों में हाथ बँटाता था। यह सेवा उसे विनम्र बनाती थी और “मैं” के भाव को धीरे-धीरे पिघलाती थी। आज की शिक्षा में “मैं क्या पाऊँगा” प्रमुख प्रश्न है। गुरुकुल शिक्षा में प्रश्न था—“मैं क्या दे सकता हूँ।” यही दृष्टि समाज को स्वस्थ बनाती है।
आज जब तकनीक शिक्षा का केंद्र बनती जा रही है, तब गुरुकुल हमें याद दिलाता है कि साधन कभी लक्ष्य नहीं हो सकते। तकनीक उपयोगी है, पर वह गुरु का स्थान नहीं ले सकती। स्क्रीन जानकारी दे सकती है, पर दृष्टि नहीं। गुरुकुल शिक्षा की प्रासंगिकता इसी संतुलन में है—जहाँ आधुनिक ज्ञान हो, पर मानवीय स्पर्श भी बना रहे।
अंततः गुरुकुल शिक्षा प्रणाली हमें यह सिखाती है कि शिक्षा का लक्ष्य केवल सफल व्यक्ति नहीं, संतुलित मनुष्य बनाना है। ऐसा मनुष्य जो कुशल भी हो, करुणामय भी हो; जो बुद्धिमान भी हो, नैतिक भी हो; जो आधुनिक भी हो, पर अपनी जड़ों से कटा हुआ न हो। आज के युग में, जहाँ बाहरी प्रगति तेज़ है पर आंतरिक स्थिरता दुर्लभ, गुरुकुल शिक्षा का यही संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक हो जाता है। गुरुकुल अतीत नहीं है— वह भविष्य की दिशा है। यदि हम उसके मूल को समझ लें, तो शिक्षा फिर से मानवता का मार्गदर्शन कर सकती है, सिर्फ़ प्रतिस्पर्धा का उपकरण नहीं बनेगी।
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