जीवन में सही निर्णय लेने की वैदिक प्रक्रिया
वैदिक परंपरा में जीवन को निर्णयों की शृंखला नहीं, बल्कि चेतना की यात्रा माना गया है। यहाँ यह प्रश्न कभी नहीं रहा कि कौन-सा निर्णय लाभ देगा, बल्कि यह रहा कि कौन-सा निर्णय धर्म के अनुकूल है। क्योंकि वैदिक दृष्टि में सही निर्णय वही है, जो मनुष्य को तत्काल सुविधा से आगे बढ़ाकर दीर्घकालिक संतुलन की ओर ले जाए। इसीलिए वैदिक प्रक्रिया किसी एक सूत्र या तकनीक पर आधारित नहीं, बल्कि एक क्रमिक आंतरिक परिष्कार पर आधारित है—जहाँ निर्णय बाहर नहीं, भीतर पकते हैं।
वैदिक प्रक्रिया का पहला चरण है—स्व-स्थिति का निरीक्षण। कोई भी निर्णय लेने से पहले यह देखना आवश्यक माना गया कि निर्णय किस अवस्था से लिया जा रहा है—भय से, क्रोध से, लोभ से या शांति से। शास्त्र कहते हैं कि जो निर्णय अशांत मन से लिया जाए, वह चाहे कितना ही तर्कसंगत क्यों न दिखे, अंततः पीड़ा देता है। इसलिए वेदों में “मनःप्रशमन” पर इतना बल दिया गया। पहले मन को स्थिर करो, फिर बुद्धि स्वयं स्पष्ट होने लगती है। यह स्थिरता ध्यान, मौन या थोड़े विराम से आती है—जहाँ प्रतिक्रिया थमती है और विवेक जागता है।
दूसरा चरण है—धर्म-दृष्टि से परीक्षण। वैदिक परंपरा में धर्म का अर्थ नियम नहीं, समष्टि-कल्याण है। कोई निर्णय केवल मेरे लिए सही है या नहीं—यह प्रश्न पर्याप्त नहीं; यह देखना भी आवश्यक है कि उससे परिवार, समाज और भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यही धर्म का परीक्षण है। यदि निर्णय केवल “मुझे क्या मिलेगा” के प्रश्न से जन्म ले रहा है, तो वह अधूरा है। धर्म-दृष्टि निर्णय को व्यापक बनाती है और स्वार्थ की संकीर्णता से बचाती है।
तीसरा चरण है—अस्थायी और स्थायी का भेद। उपनिषदों ने इसे विवेक की मूल कसौटी कहा। जो तात्कालिक सुख दे, पर दीर्घकालिक अशांति लाए—वह निर्णय वैदिक दृष्टि में सही नहीं माना गया। इसके विपरीत, जो निर्णय आज कठिन लगे, पर भविष्य में स्थिरता दे—वही सही है। यह भेद करने के लिए शास्त्र सलाह देते हैं कि निर्णय को समय की कसौटी पर रखो—“यदि यही निर्णय मैं वर्षों बाद देखूँ, तो क्या इसे सही मानूँगा?” यह प्रश्न मनुष्य को आवेग से बाहर निकालता है।
चौथा चरण है—आसक्ति की जाँच। वैदिक प्रक्रिया में यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। कई निर्णय इसलिए गलत हो जाते हैं क्योंकि हम उनसे बंधे होते हैं—किसी व्यक्ति से, किसी परिणाम से, किसी पहचान से। शास्त्र कहते हैं कि जहाँ आसक्ति अधिक होती है, वहाँ दृष्टि धुंधली हो जाती है। इसलिए निर्णय से पहले यह देखना आवश्यक है कि क्या मैं किसी विशेष परिणाम से इतना जुड़ा हूँ कि सत्य देखने में असमर्थ हो जाऊँ? यदि हाँ, तो निर्णय को कुछ समय के लिए टालना ही वैदिक विवेक है।
इस पूरी प्रक्रिया का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण भगवद्गीता में मिलता है। युद्धभूमि में खड़े अर्जुन निर्णय नहीं ले पा रहे थे। उनके सामने तर्क भी थे, भावनाएँ भी, भय भी और धर्म भी। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें कोई सीधा आदेश नहीं दिया। उन्होंने पहले अर्जुन की मानसिक स्थिति स्पष्ट की, फिर धर्म की व्याख्या की, फिर कर्म और आसक्ति का भेद बताया—और अंत में कहा, “यथेच्छसि तथा कुरु”। यह वैदिक प्रक्रिया का शिखर है—गुरु मार्ग दिखाता है, निर्णय शिष्य स्वयं करता है, पर स्पष्ट दृष्टि के साथ।
पाँचवाँ चरण है—गुरु और शास्त्र का संदर्भ। वैदिक परंपरा में निर्णय कभी अकेले नहीं लिए जाते थे। गुरु का अर्थ यहाँ केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि वह विवेक भी है जो शास्त्रों से पोषित हो। जब मन भ्रमित हो, तब किसी ऐसे दृष्टिकोण का सहारा लेना जो समय से परे सत्य को धारण करता हो—यही गुरु-तत्त्व है। यह संदर्भ निर्णय को व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर उठाता है।
छठा चरण है—कर्म-भाव। वैदिक प्रक्रिया में निर्णय के साथ परिणाम का बोझ नहीं जोड़ा जाता। निर्णय धर्मानुकूल हो—बस इतना पर्याप्त है। परिणाम समय पर स्वयं प्रकट होते हैं। जब मनुष्य सही निर्णय लेकर भी परिणाम की चिंता में डूबा रहता है, तब उसका मन फिर अशांत हो जाता है। इसलिए कहा गया—कर्म करो, फल त्यागो। यह त्याग उदासीनता नहीं, बल्कि विश्वास है—कि जो धर्म से लिया गया निर्णय है, उसका फल भी धर्ममय ही होगा।
अंततः वैदिक प्रक्रिया का सार यह है कि सही निर्णय तेज़ नहीं, स्पष्ट होता है। वह शोर में नहीं, मौन में जन्म लेता है। वह भय से नहीं, विवेक से निकलता है। वह केवल वर्तमान को नहीं, भविष्य को भी संभालता है। और सबसे महत्वपूर्ण—वह मनुष्य को भीतर से हल्का करता है। यदि कोई निर्णय लेने के बाद भीतर बोझ, अपराधबोध या लगातार बेचैनी रह जाए, तो वैदिक दृष्टि कहती है कि वहाँ कहीं न कहीं प्रक्रिया में चूक हुई है।
आज के युग में, जहाँ निर्णय त्वरित, भावनात्मक और बाहरी दबावों से प्रभावित हो जाते हैं, वैदिक प्रक्रिया और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह प्रक्रिया हमें सिखाती है कि जीवन को रिएक्शन से नहीं, रिफ्लेक्शन से जियो। सही निर्णय वही है, जो तुम्हें स्वयं के और निकट ले जाए—न कि स्वयं से दूर। निर्णय बुद्धि से लो, पर प्रकाश विवेक से पाओ। क्योंकि सही निर्णय जीवन को जीतता नहीं, उसे सही दिशा देता है।
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