माघ मास की तीर्थ चेतना: आस्था की ऊष्मा और आत्मसंयम का अभ्यास
7 फ़रवरी 2026 को माघ मास की साधना और तीर्थ चेतना एक बार फिर पूरे देश में स्पष्ट रूप से अनुभव की गई, जब ठंड के बीच आस्था की ऊष्मा ने जनमानस को भीतर तक स्पर्श किया। प्रयागराज के संगम तट से लेकर हरिद्वार और देश के अन्य प्रमुख तीर्थ क्षेत्रों तक प्रातःकालीन स्नान, जप और दान को लेकर गहरी चर्चा देखी गई।
इस दिन विशेष रूप से यह बात सामने आई कि माघ मास को केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक अनुशासन का काल माना जाता है। संतों और धर्माचार्यों ने अपने प्रवचनों में बार-बार यह स्पष्ट किया कि माघ का समय “इंद्रियों के संयम और मन की शुद्धि का काल” है, जहाँ व्यक्ति बाहरी आडंबर से हटकर भीतर की यात्रा करता है।
प्रयागराज में संगम स्नान के दौरान बड़ी संख्या में युवाओं और गृहस्थों की उपस्थिति यह संकेत देती रही कि आधुनिक जीवन की तेज़ गति के बीच भी लोग आत्मशुद्धि और आत्मसंयम की आवश्यकता को महसूस कर रहे हैं। हरिद्वार में गंगा तट पर दान और मौन जप करते साधकों ने यह संदेश दिया कि माघ की साधना केवल पाप-क्षालन की अवधारणा तक सीमित नहीं, बल्कि विचार, व्यवहार और जीवनशैली को संतुलित करने का अभ्यास है।
आज की परिस्थितियों में, जब समाज तनाव, अस्थिरता और भटकाव से जूझ रहा है, माघ मास की यह चेतना एक प्रकार का सामाजिक संकेत भी बनकर उभरी—कि शुद्धि केवल जल से नहीं, बल्कि संयमित इंद्रियों, शांत मन और उत्तरदायी कर्म से होती है। इसी कारण 7 फ़रवरी 2026 का यह दिन केवल पंचांग की तिथि नहीं रहा, बल्कि सनातन परंपरा के उस जीवित पक्ष को दर्शाता रहा, जहाँ साधना व्यक्तिगत होते हुए भी पूरे समाज को दिशा देने वाली शक्ति बन जाती है।
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