कृतज्ञता — जब जीवन शिकायत से प्रार्थना बन जाता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस साधना का परिचय कराता हूँ जो न मंत्र है, न व्रत, न यज्ञ — फिर भी सबसे शक्तिशाली है — कृतज्ञता।
सनातन कहता है — जो मिला है, उसे देखने की दृष्टि यदि जाग जाए, तो जो नहीं मिला उसका शोर अपने आप शांत हो जाता है।
कृतज्ञता का अर्थ संतोष में जड़ हो जाना नहीं। कृतज्ञता का अर्थ है — जो है, उसका सम्मान करते हुए आगे बढ़ना।
ऋषि इसलिए प्रातः सूर्य को नमन करते थे। उन्हें सूर्य से कुछ माँगना नहीं था। वे केवल यह स्वीकार कर रहे थे — “आज फिर जीवन मिला है।”
जब मनुष्य हर सुबह शिकायत से शुरू करता है, तो दिन भारी हो जाता है। और जब सुबह कृतज्ञता से शुरू होती है, तो दिन स्वयं मार्ग बना देता है।
कृतज्ञ व्यक्ति कम नहीं चाहता, वह सही चाहता है। इसलिए उसके निर्णय अधिक स्पष्ट होते हैं।
सनातन में हर यज्ञ से पहले आभार व्यक्त किया जाता है। क्योंकि जिस मन में आभार नहीं, उसमें दिया गया मंत्र भी खाली लौट आता है।
आज की दुनिया और चाहिए, और चाहिए — इसी में थक गई है।
सनातन धीरे से कहता है — ठहरो। देखो। जो है, वही तो चमत्कार है।
कृतज्ञता अभाव को नहीं मिटाती, पर अभाव की पीड़ा को जरूर मिटा देती है।
और जब पीड़ा मिटती है, तो विवेक जागता है।
जो व्यक्ति हर अनुभव के लिए धन्यवाद कहना सीख गया, वह जीवन से लड़ता नहीं — जीता है।
✍🏻 लेखक: तु ना रिं
🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला — दिन 53
सनातनी मर्म:
"कृतज्ञता वास्तव में 'Abundance Mindset' (समृद्धि की सोच) की जननी है। जो व्यक्ति 'जो है' उसके लिए आभारी नहीं है, उसे 'जो मिलेगा' वह भी कभी सुखी नहीं कर पाएगा।"
सनातन में अर्घ्य देना, दीप जलाना या हाथ जोड़ना—यह सब ब्रह्मांड को दिया गया एक 'धन्यवाद' है। जब आप धन्यवाद देते हैं, तो आप ब्रह्मांड के लिए एक चुंबक (Magnet) बन जाते हैं। याद रखें, एक कृतज्ञ हृदय में कभी दरिद्रता निवास नहीं कर सकती।

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