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श्रद्धा के साथ जीना — सनातन धर्म की मौन शक्ति | Sanatan Samvad

श्रद्धा के साथ जीना — सनातन धर्म की मौन शक्ति | Sanatan Samvad

श्रद्धा के साथ जीना — सनातन धर्म की मौन शक्ति | Sanatan Samvad

hindu pride

मैं गर्व से कहता हूँ — मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे श्रद्धा के साथ जीना सिखाता है

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं आपको सनातन धर्म की उस भावना के बारे में बताने आया हूँ जो बिना शोर किए जीवन को भीतर से मजबूत बना देती है— श्रद्धा।

श्रद्धा का मतलब आँख बंद करके मान लेना नहीं है। सनातन धर्म ऐसा नहीं सिखाता। यह कहता है— समझो, महसूस करो, और फिर भरोसा रखो। यही श्रद्धा है।

जब जीवन में सब कुछ हमारे अनुसार नहीं चलता, जब मेहनत के बाद भी फल तुरंत नहीं मिलता, तब श्रद्धा हमें टूटने नहीं देती। वह धीरे से कहती है— सब ठीक हो रहा है, बस समय लग रहा है।

सनातन धर्म में श्रद्धा डर से नहीं आती, वह अनुभव से आती है। जब इंसान देखता है कि हर कठिन समय के बाद कुछ न कुछ सीख मिली, कुछ न कुछ रास्ता खुला, तो भीतर भरोसा जन्म लेता है।

श्रद्धा का मतलब यह नहीं कि कर्म छोड़ दिए जाएँ। श्रद्धा और कर्म सनातन में साथ चलते हैं। कर्म हमारा दायित्व है, और श्रद्धा हमारी शक्ति। दोनों मिलकर जीवन को संतुलित बनाते हैं।

मैं तु ना रिं आपसे यही कहना चाहता हूँ— अगर आपके भीतर थोड़ा सा भी विश्वास है कि जीवन आपको तोड़ने नहीं, तराशने आया है, तो समझिए श्रद्धा आपके साथ है।

और जब श्रद्धा होती है, तो डर अपने आप छोटा पड़ जाता है। मन स्थिर रहता है, और कदम आगे बढ़ते रहते हैं।

और इसी कारण मैं पूरे गर्व से कहता हूँ— “हाँ, मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि श्रद्धा के साथ चला गया हर कदम व्यर्थ नहीं जाता।”

सनातनी मर्म:

"सनातन धर्म हमें 'Blind Faith' (अंधविश्वास) नहीं, बल्कि 'Luminous Faith' (प्रकाशमयी श्रद्धा) सिखाता है। यहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता है और अनुभव की प्रधानता है।"

श्रद्धा वह दीया है जो केवल रास्ते को ही नहीं, बल्कि चलने वाले के मन को भी आलोकित करता है। जब हम कहते हैं कि हम हिंदू हैं, तो हम एक ऐसी महान विरासत के उत्तराधिकारी होते हैं जहाँ ईश्वर हमसे बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर के 'आत्म-विश्वास' के रूप में प्रकट होते हैं।

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