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हर स्त्री में शक्ति का स्वरूप है | Sanatan Samvad

हर स्त्री में शक्ति का स्वरूप है | Sanatan Samvad

हर स्त्री में शक्ति का स्वरूप है

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस सत्य को स्मरण कराने आया हूँ जिसे सनातन दृष्टि ने सृष्टि के मूल में रखा है — हर स्त्री में शक्ति का स्वरूप है। यह कोई प्रशंसा का वाक्य नहीं, कोई आधुनिक विचार नहीं, बल्कि शाश्वत अनुभूति है। स्त्री को सनातन ने कभी केवल शरीर, भूमिका या संबंध के रूप में नहीं देखा; उसे सदा शक्ति के रूप में देखा है — वह शक्ति जो सृजन करती है, पोषण देती है, धारण करती है और आवश्यकता पड़ने पर संहार भी करती है।

शक्ति का अर्थ केवल बाहुबल नहीं है। शक्ति वह सामर्थ्य है जो जीवन को आगे बढ़ाती है। शक्ति वह धैर्य है जो पीड़ा में भी टूटता नहीं। शक्ति वह करुणा है जो कठोरता के बीच भी मनुष्यत्व बचाए रखती है। शक्ति वह साहस है जो बिना शोर किए अन्याय के सामने खड़ा हो जाता है। और यह सब गुण स्त्री के स्वभाव में सहज रूप से निहित हैं।

सनातन दृष्टि में ब्रह्म भी शक्ति के बिना निष्क्रिय है। शिव बिना शक्ति के शव समान हैं — यह कथन किसी प्रतीक का खेल नहीं, गहरे सत्य का संकेत है। चेतना और शक्ति जब तक एक साथ न हों, सृष्टि नहीं चलती। यही कारण है कि स्त्री को पूरक नहीं, मूल माना गया। वह जीवन की सहचरी नहीं, जीवन की धारक है।

स्त्री की शक्ति केवल जन्म देने में नहीं, दिशा देने में भी है। वह माँ बनकर संस्कार देती है, बहन बनकर संवेदना सिखाती है, पत्नी बनकर संतुलन रचती है, पुत्री बनकर प्रेम और साहस दोनों का विस्तार करती है। और इन सभी भूमिकाओं के परे भी वह एक स्वतंत्र चेतना है, जिसका अपना अस्तित्व, अपना विवेक और अपना धर्म है। स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह संबंधों में बँधकर भी स्वयं को पूरी तरह खोती नहीं।

स्त्री की शक्ति का एक गहरा रूप सहनशीलता है। यह सहनशीलता दुर्बलता नहीं, अद्भुत आंतरिक बल है। पीड़ा सहकर भी प्रेम बनाए रखना, अपमान सहकर भी मर्यादा न खोना, संकट में भी परिवार और समाज को थामे रखना — यह वह शक्ति है जिसे केवल बाहर से देखकर नहीं समझा जा सकता। यही कारण है कि स्त्री को कमजोर समझने वाली दृष्टि स्वयं कमजोर होती है।

स्त्री की शक्ति मौन में भी प्रकट होती है और संघर्ष में भी। वह जब मौन रहती है, तब भी बहुत कुछ साध रही होती है। और जब वह बोलती है, तब इतिहास बदल देती है। उसकी वाणी में करुणा हो सकती है, पर आवश्यकता पड़ने पर वही वाणी सिंहनाद बन जाती है। यह द्वैत नहीं, पूर्णता है।

सनातन परंपरा ने स्त्री को केवल पूजनीय कहकर अलग नहीं किया, बल्कि उसे जीवन के केंद्र में रखा। क्योंकि जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, वहाँ जीवन सुरक्षित रहता है। और जहाँ स्त्री अपमानित होती है, वहाँ समाज भीतर से सड़ने लगता है। स्त्री की गरिमा किसी कानून से नहीं, दृष्टि से सुरक्षित होती है। जब दृष्टि शुद्ध होती है, तब व्यवहार अपने आप शुद्ध हो जाता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि स्त्री की शक्ति को केवल त्याग और सहनशीलता तक सीमित कर देना भी अन्याय है। शक्ति का अर्थ यह भी है कि स्त्री को अपने निर्णय लेने का अधिकार हो, अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता हो, और अपनी सीमाएँ स्वयं निर्धारित करने का साहस हो। सनातन की शक्ति जड़ नहीं है, वह जाग्रत और गतिशील है।

हर स्त्री में शक्ति का स्वरूप इसलिए है क्योंकि हर स्त्री में जीवन को देखने, सहने और सँवारने की अद्भुत क्षमता है। वह गिरकर भी उठना जानती है, टूटकर भी जोड़ना जानती है, और थककर भी आगे बढ़ना जानती है। यही शक्ति उसे सामान्य से असाधारण बनाती है।

अंततः स्त्री की शक्ति का सम्मान करना किसी एक वर्ग का समर्थन नहीं, बल्कि सृष्टि के संतुलन की रक्षा करना है। जब स्त्री सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त होती है, तब पूरा समाज संतुलित होता है। यही सनातन का दृष्टिकोण है — पूजन केवल शब्दों से नहीं, व्यवहार से।

इसलिए स्मरण रहे —
स्त्री को शक्ति कहा नहीं जाता, स्त्री शक्ति है।
उसका सम्मान करना धर्म है,
और उसका अपमान करना अधर्म।

जो इस सत्य को समझ लेता है,
वह केवल स्त्री का नहीं,
समूची सृष्टि की शक्ति का सम्मान करना सीख लेता है।

सनातनी मर्म:

"यह लेख हमें 'अर्घनारीश्वर' के संतुलन का बोध कराता है। संसार केवल 'पुरुष' या केवल 'स्त्री' से नहीं, बल्कि दोनों के 'सम्मान' और 'सामंजस्य' से चलता है।"

स्त्री की शक्ति को उसकी 'सहनशीलता' तक सीमित करना उसकी अवमानना है; उसकी वास्तविक शक्ति उसके 'जाग्रत विवेक' और 'निर्णय क्षमता' में है। जब हम किसी स्त्री का अपमान करते हैं, तो हम उस 'सृजन-ऊर्जा' का अपमान करते हैं जिसके बिना यह ब्रह्मांड शून्य है।

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