सनातन दृष्टि से सफलता की वास्तविक परिभाषा
सनातन दृष्टि में सफलता वह नहीं है, जिसे संसार तालियों से नापे। यहाँ सफलता का अर्थ ऊँचा पद, बड़ा धन, प्रसिद्धि या दूसरों से आगे निकल जाना नहीं माना गया। सनातन परंपरा सफलता को अवस्था मानती है—ऐसी अवस्था, जहाँ मनुष्य भीतर से संतुलित, स्पष्ट और शांत हो। यहाँ प्रश्न यह नहीं है कि तुमने क्या पाया, बल्कि यह है कि पाकर तुम कैसे बने। यदि उपलब्धियों के साथ अहंकार बढ़ गया, भय बढ़ गया या अशांति बढ़ गई, तो सनातन दृष्टि में वह सफलता नहीं, केवल विस्तार है—जिसका अंत थकान होता है।
सनातन दर्शन जीवन को केवल बाहरी यात्रा नहीं मानता, वह उसे भीतर की यात्रा भी मानता है। इसलिए सफलता का पहला मापदंड है—आत्म-संतुलन। क्या व्यक्ति अपने निर्णयों के साथ सहज है? क्या वह रात को अपने कर्मों के साथ सो सकता है? क्या उसका विवेक उसकी उपलब्धियों के नीचे दबा नहीं है? यदि मनुष्य सब कुछ पाकर भी भीतर से बेचैन है, तो सनातन दृष्टि कहती है—वह सफल नहीं हुआ, वह केवल व्यस्त हुआ है।
इस दृष्टि का सबसे स्पष्ट प्रकाश हमें भगवद्गीता में मिलता है। युद्धभूमि में अर्जुन के पास सामर्थ्य थी, कौशल था, पर वह सफल अवस्था में नहीं था—क्योंकि उसका मन भ्रमित था। वहीं भगवान कृष्ण सफलता की परिभाषा बदल देते हैं। वे कहते हैं—कर्म करो, पर फल की आसक्ति छोड़ do। इसका अर्थ यह नहीं कि परिणाम महत्वहीन हैं, बल्कि यह कि परिणाम तुम्हारी शांति का मूल्य न बन जाएँ। सनातन दृष्टि में वही व्यक्ति सफल है, जो कर्म करता है, पर कर्म उसे बाँधता नहीं।
सनातन परंपरा सफलता को धर्म से अलग नहीं देखती। धर्म का अर्थ यहाँ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जो जीवन को धारण करे वह है। यदि कोई व्यक्ति धन कमाकर परिवार तो पालता है, पर रिश्तों को खो देता है; यदि वह पद पाकर नैतिकता खो देता है; यदि वह जीतकर करुणा खो देता है—तो वह सफलता अधूरी मानी जाती है। सनातन दृष्टि में सफलता वह है, जो समाज को भी उठाए और स्वयं को भी गिरने न दे।
एक गहरा मापदंड है—आसक्ति की मात्रा। आधुनिक दृष्टि सफलता को संग्रह से जोड़ती है; सनातन दृष्टि उसे स्वतंत्रता से जोड़ती है। जो व्यक्ति बहुत कुछ रखकर भी उससे बँधा नहीं है, वह सफल है। और जो थोड़ा रखकर भी उससे चिपका हुआ है, वह अभी सीख रहा है। वैराग्य यहाँ त्याग नहीं, बल्कि संतुलन है—कि वस्तुएँ तुम्हारे पास हों, तुम वस्तुओं के पास न रहो। यही आंतरिक स्वतंत्रता सनातन सफलता का हृदय है।
सनातन दृष्टि में सफलता का एक और सूक्ष्म लक्षण है—विवेक का जीवित रहना। सफल वही है, जिसके पास विकल्प होते हुए भी वह अधर्म नहीं चुनता। जो कर सकता है, पर नहीं करता—क्योंकि वह जानता है कि सब कुछ कर सकना ही सफलता नहीं है। विवेक जब जीवित रहता है, तब शक्ति कल्याणकारी बनती है। विवेक मर जाए, तो सबसे बड़ी उपलब्धि भी समाज के लिए बोझ बन सकती है।
यह भी कहा गया है कि सफलता का सही परीक्षण समय करता है। जो आज चमकता है, वह सफल नहीं; जो वर्षों बाद भी शांति दे, वही सफल है। सनातन दृष्टि तात्कालिक नहीं, दीर्घकालिक है। वह पूछती है—क्या तुम्हारे निर्णयों का फल वर्षों बाद भी तुम्हें हल्का बनाएगा? क्या तुम्हारी आज की जीत भविष्य में पश्चाताप नहीं बनेगी? यदि उत्तर हाँ है, तो वही सफलता है।
सनातन परंपरा गृहस्थ और संन्यासी—दोनों को सफलता के योग्य मानती है, पर शर्त एक ही है—अंतर की शुद्धता। गृहस्थ संसार में रहकर भी मुक्त हो सकता है, और संन्यासी त्याग में रहकर भी बँधा हो सकता है। इसलिए सफलता वेश, पद या भूमिका से तय नहीं होती; वह अवस्था से तय होती है। जहाँ मन शांत है, निर्णय स्पष्ट हैं और करुणा बची हुई है—वहीं सफलता है।
आज के युग में, जहाँ सफलता को तुलना से मापा जाता है, सनातन दृष्टि तुलना से मुक्त करती है। यहाँ सफलता प्रतिस्पर्धा नहीं, समन्वय है। तुम दूसरे से आगे नहीं, स्वयं से बेहतर बने—इतना पर्याप्त है। यदि तुम कल से अधिक संतुलित हो, अधिक स्पष्ट हो और अधिक करुणामय हो—तो तुम सफल हो रहे हो।
अंततः सनातन दृष्टि से सफलता की वास्तविक परिभाषा यही है—
सफल वह नहीं, जिसके पास सबसे अधिक है;
सफल वह है, जिसे सबसे कम बाँधता है।
सफल वह नहीं, जो शोर में जीते;
सफल वह है, जो शांति में स्थिर रहे।
और सफल वह नहीं, जो केवल जीतता रहे;
सफल वह है, जो जीतकर भी मानव बना रहे।
यही सनातन की सफलता है—
जहाँ उपलब्धियाँ बाहर होती हैं,
पर विजय भीतर घटित होती है।
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