धर्म और बुद्धि का संतुलन क्यों आवश्यक है
सनातन परंपरा में धर्म और बुद्धि को दो अलग मार्ग नहीं माना गया, बल्कि एक ही सत्य के दो आधार कहा गया है। धर्म दिशा देता है, बुद्धि निर्णय का उपकरण देती है। यदि दिशा हो और निर्णय की क्षमता न हो, तो मनुष्य जड़ हो जाता है; और यदि निर्णय की तीक्ष्णता हो पर दिशा न हो, तो वही तीक्ष्णता विनाश का कारण बन जाती है। इसलिए शास्त्र बार-बार कहते हैं कि धर्म और बुद्धि का संतुलन ही जीवन को स्थिर, शांत और सार्थक बनाता है।
धर्म का अर्थ यहाँ संप्रदाय या अनुष्ठान नहीं है। धर्म वह है जो जीवन को धारण करे—जो व्यक्ति और समाज दोनों के कल्याण का आधार बने। बुद्धि वह शक्ति है जो तर्क करती है, तुलना करती है, विकल्प चुनती है। यदि बुद्धि धर्म से कट जाए, तो वह चालाकी बन जाती है। वह परिणाम तो ला सकती है, पर शांति नहीं। और यदि धर्म बुद्धि से कट जाए, तो वह अंध-आस्था बन सकता है—जहाँ प्रश्न, समझ और परिस्थिति की सूक्ष्मता खो जाती है। यही कारण है कि संतुलन आवश्यक है।
भगवद्गीता इस संतुलन का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है। युद्धभूमि में खड़े अर्जुन के सामने धर्म का प्रश्न था—क्या युद्ध उचित है? पर केवल धर्म की भावना पर्याप्त नहीं थी; परिस्थिति की बुद्धिसंगत समझ भी आवश्यक थी। तब भगवान कृष्ण ने केवल धर्म का उपदेश नहीं दिया, बल्कि तर्क, विश्लेषण और परिणामों की व्याख्या भी की। उन्होंने अर्जुन को अंध-भक्ति नहीं सिखाई; उन्होंने उसकी बुद्धि को जाग्रत किया। अंत में उन्होंने कहा—“विचार कर, फिर निर्णय ले।” यही संतुलन है—धर्म का आधार, बुद्धि का परीक्षण।
धर्म बिना बुद्धि के कई बार कठोरता में बदल सकता है। यदि कोई व्यक्ति नियमों का पालन तो करता है, पर परिस्थिति की संवेदनशीलता नहीं समझता, तो उसका धर्म दूसरों के लिए बोझ बन सकता है। उदाहरण के लिए, यदि सत्य बोलना धर्म है, तो बुद्धि यह सिखाती है कि सत्य कब और कैसे कहा जाए। बिना बुद्धि के सत्य भी हिंसक हो सकता है। इसलिए शास्त्र सत्य के साथ हित को भी जोड़ते हैं—सत्य वही जो हितकारी हो।
इसी प्रकार बुद्धि बिना धर्म के स्वार्थी हो जाती है। वह लाभ, शक्ति और विजय की गणना तो कर सकती है, पर न्याय और करुणा की नहीं। महाभारत में दुर्योधन और शकुनि बुद्धिमान थे, पर उनका निर्णय धर्म से कट चुका था। परिणाम तत्काल विजय नहीं, अंततः विनाश था। शास्त्र यह सिखाते हैं कि बुद्धि की तीक्ष्णता तभी कल्याणकारी है जब वह धर्म के नियंत्रण में हो।
सनातन दृष्टि में धर्म और बुद्धि का संतुलन व्यक्ति को तीन स्तरों पर स्थिर करता है—व्यक्तिगत, सामाजिक और आध्यात्मिक। व्यक्तिगत स्तर पर यह संतुलन अपराधबोध और भ्रम से बचाता है। जब निर्णय धर्म-संगत और बुद्धि-परीक्षित हो, तो मन शांत रहता है। सामाजिक स्तर पर यह संतुलन न्याय और सह-अस्तित्व को मजबूत करता है। आध्यात्मिक स्तर पर यह संतुलन अहंकार को नियंत्रित करता है—क्योंकि व्यक्ति जानता है कि उसकी बुद्धि भी अंतिम नहीं है; उसे धर्म की कसौटी पर परखना होगा।
यह संतुलन अभ्यास से आता है। पहले धर्म को समझना आवश्यक है—धर्म का सार करुणा, सत्य, संयम और समष्टि-कल्याण है। फिर बुद्धि को प्रशिक्षित करना आवश्यक है—पढ़ना, विचार करना, प्रश्न करना। जब ये दोनों मिलते हैं, तब निर्णय केवल भावनात्मक या केवल तर्कपूर्ण नहीं रहते; वे संतुलित होते हैं। यही संतुलन जीवन को स्थायी सफलता की ओर ले जाता है। आज के युग में यह संतुलन और भी आवश्यक है।
एक ओर अंध-आस्था का खतरा है, दूसरी ओर केवल तर्क और लाभ की दौड़। यदि धर्म बुद्धि से अलग हो जाए, तो कट्टरता जन्म लेती है। यदि बुद्धि धर्म से अलग हो जाए, तो शोषण जन्म लेता है। सनातन परंपरा इन दोनों अतिरेक से बचाती है। वह कहती है—सोचो भी, और संवेदना भी रखो; तर्क भी करो, और करुणा भी रखो। अंततः धर्म और बुद्धि का संतुलन वही है जो जीवन को सही दिशा और सही गति दोनों देता है। दिशा धर्म से आती है, गति बुद्धि से। दिशा बिना गति ठहराव है; गति बिना दिशा दुर्घटना है।
सनातन संदेश यही है— बुद्धि को तेज बनाओ, पर उसे धर्म के अधीन रखो। धर्म को हृदय में रखो, पर उसे बुद्धि से परखो। जब दोनों साथ चलते हैं, तभी मनुष्य न केवल सफल होता है, बल्कि स्थिर, न्यायपूर्ण और शांत भी रहता है।
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