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संस्कार, लोक और समय के साथ बहता धर्म

संस्कार, लोक और समय के साथ बहता धर्म

संस्कार, लोक और समय के साथ बहता धर्म

16 Sanskar

हिन्दू धर्म का इतिहास तब और स्पष्ट होता है जब हम उसे केवल राजाओं, युद्धों या ग्रंथों से नहीं, बल्कि मानव जीवन के हर पड़ाव से जोड़कर देखते हैं। यह परंपरा मनुष्य के जन्म से पहले ही उसकी प्रतीक्षा करती है और मृत्यु के बाद भी उसके कर्मों के साथ चलती रहती है। इसी कारण हिन्दू धर्म में “इतिहास” कोई अलग विषय नहीं, बल्कि जीवन की स्मृति है।

जब ऋषियों ने देखा कि समाज केवल तपस्वियों से नहीं बनता, बल्कि गृहस्थ ही उसकी रीढ़ है, तब धर्म ने स्वयं को घर-आँगन के अनुसार ढाल लिया। यहीं से संस्कारों की परंपरा जन्म लेती है। गर्भ से लेकर अंत्येष्टि तक जीवन को सोलह पड़ावों में समझा गया, ताकि मनुष्य यह न भूले कि वह केवल शरीर नहीं, एक यात्रा करता हुआ आत्मतत्व है। इन संस्कारों में कोई दिखावा नहीं था; वे मनुष्य को प्रकृति, समाज और आत्मा से जोड़ने के माध्यम थे।

धीरे-धीरे धर्म ने लोकभाषा सीखी। जो ज्ञान पहले ऋषि कुटियों में गूंजता था, वह अब कथाओं, गीतों और पर्वों में उतर आया। यही वह क्षण था जब हिन्दू धर्म वास्तव में जनधर्म बना। दीप जलाना, व्रत रखना, कथा सुनना, पर्व मनाना — ये सब इतिहास की किताबें नहीं, बल्कि स्मृति के दीपक थे, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी जलते रहे। इन्हीं से समाज को यह याद दिलाया जाता रहा कि जीवन केवल आज का नहीं, अनंत प्रवाह का एक क्षण है।

समय के साथ जब विभिन्न क्षेत्रों, जातियों और भाषाओं का विस्तार हुआ, तो धर्म ने उन्हें बाँधने की जगह समाहित किया। एक ही सत्य के अनेक रूप स्वीकार किए गए। कहीं वही सत्य शिव बना, कहीं विष्णु, कहीं शक्ति। यही लचीलापन हिन्दू धर्म को स्थिर नहीं, बल्कि जीवंत बनाता है। जहाँ अन्य परंपराएँ नियमों से पहचानी जाती हैं, वहाँ हिन्दू धर्म को उसके व्यवहार से जाना जाता है।

आक्रमणों और सत्ता परिवर्तन के युग में यह धर्म इसलिए नहीं टूटा क्योंकि यह किसी एक संरचना पर निर्भर नहीं था। इसका इतिहास पत्थरों में नहीं, बल्कि मानस में अंकित था। जब मंदिर टूटे, तब भी पर्व चलते रहे। जब ग्रंथ जले, तब भी कथाएँ जीवित रहीं। यही कारण है कि हिन्दू धर्म का इतिहास केवल संरक्षण का नहीं, बल्कि अनुकूलन और पुनर्जागरण का इतिहास है।

आधुनिक काल में, जब प्रश्न पूछे जाने लगे कि यह धर्म क्या है, कहाँ से आया और किसने बनाया — तब हिन्दू परंपरा ने कोई एक उत्तर नहीं दिया। उसने कहा, “मुझे जीयो, समझ जाओगे।” यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। यह धर्म तर्क से नहीं, अनुभव से खुलता है; घोषणा से नहीं, साधना से प्रकट होता है।

इसलिए हिन्दू धर्म का इतिहास आगे भी चलता रहता है — आज भी, अभी भी। हर पीढ़ी इसे नया रूप देती है, बिना उसकी जड़ काटे। यही सनातनता है — परिवर्तन में भी निरंतरता।

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