क्षमा — भूल को नहीं, बोझ को छोड़ना
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस शक्ति का मर्म बताने आया हूँ
जिसे लोग दुर्बलता समझ लेते हैं,
पर सनातन में यह आत्मिक बल है — क्षमा।
क्षमा का अर्थ गलत को सही ठहराना नहीं। क्षमा का अर्थ है — अपने भीतर जमा विष को बाहर कर देना।
जब किसी ने हमें चोट पहुँचाई, तो दो पीड़ाएँ जन्म लेती हैं। एक — जो उसने दी। दूसरी — जो हम रोज़-रोज़ याद करके खुद को देते हैं।
सनातन कहता है — पहली पीड़ा टल नहीं सकती, पर दूसरी हमारी पसंद है।
क्षमा इसलिए कठिन लगती है क्योंकि अहंकार न्याय अपने हाथ में रखना चाहता है। वह कहता है — “जब तक सामने वाला झुके नहीं, मैं शांत नहीं होऊँगा।”
पर शांति दूसरे के झुकने से नहीं, अपने ढीले पड़ने से आती है।
क्षमा न्याय का विरोध नहीं है। क्षमा मन की सफ़ाई है। न्याय समाज का कार्य है, क्षमा आत्मा का।
जो क्षमा नहीं करता, वह दूसरे को नहीं, खुद को बाँधता है। और जो क्षमा कर देता है, वह स्वयं को मुक्त कर लेता है।
महाभारत कहता है — क्षमा वीरों का आभूषण है। क्योंकि जो भीतर से मजबूत होता है, वही छोड़ सकता है।
क्षमा का सबसे बड़ा लाभ यह है — यह तुम्हें अतीत से वर्तमान में लौटा देती है। और वर्तमान में लौटना ही जीवन है।
सनातन इसलिए क्षमा सिखाता है, क्योंकि वह जानता है — भारी मन ऊँचाई पर नहीं पहुँचता।
जो हल्का हो गया, वही ऊपर उठा।
✍🏻 लेखक: तु ना रिं
🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला — दिन 55

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