शास्त्रों में बताए गए सात प्रकार के अज्ञान
सनातन शास्त्रों में अज्ञान को केवल “न जानना” नहीं कहा गया, बल्कि उसे चेतना की विकृत अवस्था माना गया है। इसीलिए यहाँ अज्ञान को एक रूप में नहीं, विविध रूपों में पहचाना गया। कारण स्पष्ट है—मनुष्य अलग-अलग स्तरों पर भटकता है। कभी वह सत्य को देख ही नहीं पाता, कभी देख कर भी स्वीकार नहीं करता, और कभी स्वीकार कर के भी आचरण में नहीं उतारता। शास्त्रों ने इसी सूक्ष्मता के कारण अज्ञान के सात प्रकार बताए हैं। ये सात प्रकार कोई दार्शनिक सूची नहीं, बल्कि मानव जीवन की वास्तविक आंतरिक अवस्थाएँ हैं।
पहला अज्ञान है — स्वरूप-अज्ञान। यह सबसे मूल और सबसे गहरा अज्ञान है। इसमें मनुष्य यह भूल जाता है कि वह कौन है। वह स्वयं को केवल शरीर, नाम, जाति, पद या भूमिका मान लेता है। उपनिषदों के अनुसार यही मूल भ्रांति है, जिससे अन्य सभी भ्रांतियाँ जन्म लेती हैं। जब मनुष्य स्वयं को नश्वर शरीर मान लेता है, तब मृत्यु का भय, असुरक्षा और संग्रह की प्रवृत्ति स्वाभाविक हो जाती है। यही अज्ञान जन्म-मरण के चक्र का मूल कारण बताया गया है।
दूसरा अज्ञान है — अस्थिर को स्थिर मानना। शास्त्र कहते हैं कि संसार परिवर्तनशील है, पर अज्ञानी मनुष्य उसे स्थायी मान लेता है। वह संबंधों, पद, धन और सुखों को सदा रहने वाला समझ बैठता है। जब ये बदलते हैं—और बदलते ही हैं—तो मनुष्य टूट जाता है। यह अज्ञान जीवन में बार-बार दुःख का कारण बनता है, क्योंकि अपेक्षा स्थिर होती है, पर वास्तविकता परिवर्तनशील।
तीसरा अज्ञान है — दुःख को सुख मान लेना। शास्त्र इसे अत्यंत सूक्ष्म अज्ञान कहते हैं। इंद्रिय-सुख, अहंकार-सुख और तात्कालिक आनंद वास्तव में दीर्घकालिक दुःख का कारण बनते हैं, पर अज्ञानी मनुष्य उन्हें ही सुख मान लेता है। भगवद्गीता में इसे रजस और तमस से उत्पन्न सुख कहा गया है—जो आरंभ में मधुर लगता है, पर अंत में विष बन जाता है। यह अज्ञान मनुष्य को बार-बार उन्हीं कर्मों की ओर ले जाता है, जो उसे भीतर से खाली करते हैं।
चौथा अज्ञान है — अधर्म को धर्म समझ लेना। यह सामाजिक और नैतिक स्तर का अज्ञान है। जब मनुष्य अपने स्वार्थ, भय या लाभ को ही धर्म मान लेता है, तब यह अज्ञान प्रकट होता है। शास्त्रों के अनुसार धर्म वह है जो समष्टि का कल्याण करे, पर अज्ञान में व्यक्ति अपनी सुविधा को ही धर्म घोषित कर देता है। यही कारण है कि अन्याय, शोषण और हिंसा भी कई बार “धर्म” के नाम पर किए जाते हैं। यह अज्ञान समाज को सबसे अधिक क्षति पहुँचाता है।
पाँचवाँ अज्ञान है — ज्ञान का अहंकार। यह वह अवस्था है, जहाँ व्यक्ति कुछ जान लेने के बाद सीखना बंद कर देता है। वह शास्त्र पढ़ लेता है, वचन याद कर लेता है, पर विनम्रता खो देता है। शास्त्र कहते हैं—जहाँ ज्ञान विनय नहीं लाता, वहाँ वह ज्ञान नहीं, अज्ञान का ही सूक्ष्म रूप है। यह अज्ञान सबसे खतरनाक इसलिए है, क्योंकि यह स्वयं को ज्ञान समझता है और सुधार की संभावना समाप्त कर देता है।
छठा अज्ञान है — कर्म और फल के संबंध का भ्रम। इसमें मनुष्य यह मानने लगता है कि उसके कर्मों का कोई गहरा नैतिक परिणाम नहीं है, या सब कुछ केवल भाग्य से होता है। शास्त्र इस अज्ञान को अत्यंत विनाशकारी मानते हैं। जब व्यक्ति कर्म की जिम्मेदारी से बचने लगता है, तब वह अपने ही जीवन का कर्ता नहीं रह जाता। यही अज्ञान उसे बार-बार दूसरों को दोष देने वाला बना देता है।
सातवाँ और अंतिम अज्ञान है — प्रश्न न करना। सनातन शास्त्रों में यह अत्यंत स्पष्ट कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रश्न करना छोड़ देता है, वह अज्ञान में स्थिर हो जाता है। प्रश्न न करना यहाँ श्रद्धा नहीं, जड़ता मानी गई है। उपनिषदों की पूरी परंपरा प्रश्नों पर आधारित है। जहाँ प्रश्न मर जाते हैं, वहाँ ज्ञान भी धीरे-धीरे निष्प्राण हो जाता है। यह अज्ञान सबसे शांत दिखाई देता है, पर भीतर से सबसे गहरा होता है।
इन सातों प्रकार के अज्ञानों को समझने पर यह स्पष्ट होता है कि शास्त्रों में अज्ञान को “पाप” क्यों कहा गया। क्योंकि अज्ञान केवल गलती नहीं कराता—वह गलत जीवन जीने पर मजबूर करता है। और इसी कारण सनातन धर्म में मुक्ति का मार्ग दंड से नहीं, ज्ञान से जोड़ा गया है। उपनिषद कहते हैं—अज्ञान हटाना है, किसी को दोषी ठहराना नहीं। जैसे दीपक जलते ही अंधकार स्वयं हट जाता है, वैसे ही ज्ञान प्रकट होते ही ये सातों अज्ञान धीरे-धीरे क्षीण होने लगते हैं।
पहला हटता है स्वरूप-अज्ञान, और उसके साथ ही शेष सब अपने आप ढीले पड़ने लगते हैं। अंततः सनातन शास्त्र हमें यह नहीं सिखाते कि “तुम अज्ञानी हो”, वे यह सिखाते हैं कि — अज्ञान पहचाना जा सकता है, और हटाया जा सकता है। और जिस दिन मनुष्य अपने अज्ञान को पहचान लेता है, उसी दिन वह ज्ञान की यात्रा पर चल पड़ता है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें