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सनातन संस्कृति में वाणी की शुद्धता का महत्व

सनातन संस्कृति में वाणी की शुद्धता का महत्व

सनातन संस्कृति में वाणी की शुद्धता का महत्व

Purity of Speech Sanatan Sanskriti

सनातन संस्कृति में वाणी को केवल बोलने का माध्यम नहीं माना गया, बल्कि सृष्टि की मूल शक्ति समझा गया है। वेदों की शुरुआत ही “वाक्” की महिमा से होती है। यहाँ यह मान्यता है कि सृष्टि का प्रथम स्पंदन “नाद” था—और वही नाद आगे चलकर शब्द बना। इसीलिए वाणी को साधारण ध्वनि नहीं, बल्कि चेतना की अभिव्यक्ति कहा गया। जब शब्द निकले, तो उन्होंने केवल संवाद नहीं बनाया—उन्होंने संबंध बनाए, संस्कार बनाए और सभ्यता की दिशा तय की। इसलिए वाणी की शुद्धता सनातन संस्कृति में केवल नैतिक नियम नहीं, आध्यात्मिक अनुशासन है।

वाणी का शुद्ध होना केवल इतना नहीं कि वह मधुर हो। शुद्ध वाणी वह है जो सत्य हो, हितकारी हो और संयमित हो। मनुस्मृति और अन्य धर्मग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि सत्य बोलना चाहिए, पर ऐसा सत्य जो किसी का अनावश्यक हृदय भंग न करे। कठोर सत्य भी यदि करुणा से कहा जाए, तो वह शुद्ध माना जाता है। परंतु मीठा असत्य, चाहे वह सुखद लगे, वाणी की अशुद्धि है। यही सनातन दृष्टि का सूक्ष्म संतुलन है—सत्य और करुणा का मेल।

वेदों का पाठ करने वाले ऋषि-मुनि वाणी को तपस्या का विषय मानते थे। वे शब्दों के उच्चारण में इतनी सावधानी रखते थे कि स्वर, मात्रा और विराम तक निश्चित थे। क्योंकि उनका विश्वास था कि शब्दों का कंपन वातावरण को प्रभावित करता है। आज आधुनिक विज्ञान भी ध्वनि-तरंगों के प्रभाव को स्वीकार करता है। यदि एक मधुर ध्वनि मन को शांत कर सकती है, तो कठोर और कटु शब्द भी मन को घायल कर सकते हैं। यही कारण है कि मंत्र-जप और नाम-स्मरण को वाणी-शुद्धि का साधन माना गया।

सनातन संस्कृति में वाणी का संबंध देवी माता सरस्वती से जोड़ा गया है। सरस्वती केवल ज्ञान की देवी नहीं, वाक्-शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। यह प्रतीक बताता है कि ज्ञान और वाणी एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। यदि वाणी अशुद्ध है, तो ज्ञान भी विकृत हो जाता है। इसलिए विद्यार्थी शिक्षा आरंभ करने से पहले सरस्वती वंदना करता है—यह केवल परंपरा नहीं, वाणी को संयमित रखने का संकल्प है।

वाणी की अशुद्धि के कई रूप हैं—कटुता, व्यंग्य, अपमान, चुगली, झूठ और अहंकार। ये सब धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर नकारात्मक संस्कार बना देते हैं। जो व्यक्ति निरंतर कठोर शब्दों का प्रयोग करता है, उसका मन भी उसी कठोरता से भर जाता है। सनातन संस्कृति यह मानती है कि वाणी केवल बाहर नहीं जाती, वह भीतर भी लौटती है। इसलिए जो शब्द हम दूसरों के लिए बोलते हैं, वे हमारे भीतर भी संस्कार बनाते हैं।

महाभारत इसका गहरा उदाहरण है। एक कटु वचन ने युद्ध का बीज बो दिया। शब्द तलवार से अधिक तीखे हो सकते हैं। वे शरीर नहीं, हृदय को घायल करते हैं। और हृदय के घाव लंबे समय तक रहते हैं। इसीलिए शास्त्र कहते हैं कि वाणी को बाण मत बनाओ; उसे पुल बनाओ। वाणी से संबंध जोड़े जाएँ, तो समाज मजबूत होता है; वाणी से विभाजन हो, तो समाज टूट जाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से वाणी की शुद्धता का सीधा संबंध मन की शुद्धता से है। मन में जैसा भाव होगा, वैसी ही वाणी निकलेगी। इसलिए संत-महात्मा पहले मन को साधते हैं, फिर वाणी अपने आप संयमित हो जाती है। वे कम बोलते हैं, पर जब बोलते हैं, तो उनके शब्दों में भार होता है—क्योंकि वे अनुभव से निकले होते हैं, आवेश से नहीं।

सनातन संस्कृति में मौन को भी वाणी की शुद्धि का साधन माना गया है। मौन केवल चुप रहना नहीं, बल्कि अनावश्यक शब्दों से बचना है। जब व्यक्ति मौन का अभ्यास करता है, तो उसे अपने ही शब्दों का प्रभाव समझ में आने लगता है। वह देखता है कि कितनी बार वह बिना सोचे बोल देता है, और कितनी बार उसके शब्द केवल प्रतिक्रिया होते हैं, प्रतिक्रिया नहीं, प्रतिक्रिया का परिणाम होते हैं। मौन से वाणी पर अधिकार आता है।

गुरु-शिष्य परंपरा में भी वाणी का विशेष स्थान है। गुरु कम शब्दों में गहरी बात कहता है। शिष्य ध्यान से सुनता है। वहाँ शोर नहीं, संवाद होता है। आज के युग में शब्दों की बाढ़ है—सोशल मीडिया, समाचार, बहसें—पर शुद्ध वाणी दुर्लभ होती जा रही है। लोग बोलने से पहले सोचते कम हैं, प्रतिक्रिया अधिक देते हैं। इसी कारण अशांति बढ़ रही है। सनातन संस्कृति हमें स्मरण कराती है कि शब्दों का संयम ही शांति का मार्ग है।

वाणी की शुद्धता केवल धार्मिक विषय नहीं, सामाजिक आवश्यकता भी है। यदि परिवार में संवाद मधुर हो, तो संबंध स्थिर रहते हैं। यदि समाज में भाषा संयमित हो, तो मतभेद संघर्ष में नहीं बदलते। यदि नेता और शिक्षक वाणी का ध्यान रखें, तो पीढ़ियों का संस्कार सुरक्षित रहता है। इसलिए वाणी की शुद्धता व्यक्तिगत साधना से आगे बढ़कर सामाजिक जिम्मेदारी बन जाती है।

अंततः, सनातन संस्कृति का संदेश स्पष्ट है—वाणी ईश्वर की देन है। उसे व्यर्थ न करें। शब्दों को हल्के में न लें। बोलने से पहले विचार करें—क्या यह सत्य है? क्या यह हितकारी है? क्या यह आवश्यक है? यदि तीनों का उत्तर “हाँ” हो, तभी वाणी को प्रवाहित होने दें। क्योंकि एक शुद्ध वचन किसी का जीवन बदल सकता है, और एक अशुद्ध वचन वर्षों की साधना नष्ट कर सकता है। वाणी में शक्ति है—सृजन की भी, विनाश की भी। सनातन संस्कृति हमें सिखाती है— वाणी को शस्त्र नहीं, शास्त्र बनाओ। क्योंकि जहाँ शब्द शुद्ध होते हैं, वहीं मन, समाज और आत्मा भी शुद्ध होने लगती है।

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