संघर्ष ही व्यक्तित्व की शिल्पशाला है
सनातन दृष्टि में जीवन कोई आरामगाह नहीं, बल्कि आत्मा की प्रयोगशाला है। यहाँ मनुष्य को गढ़ा जाता है—तप से, धैर्य से और निरंतर कर्म से। इसलिए यह कथन कि “प्रेशर से ही डायमंड बनते हैं” कोई आधुनिक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि ऋषि-दृष्टि का सहज निष्कर्ष है। जो जीवन में संघर्ष से गुजरता है, वही अपने भीतर छिपी क्षमता को पहचान पाता है।
भगवद्गीता के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह स्मरण कराते हैं कि मनुष्य क्षणभर भी अकर्म नहीं रह सकता। कर्म में प्रवृत्त होना ही जीवन का स्वभाव है, और जहाँ कर्म है, वहाँ परीक्षा भी है। इसलिए चुनौतियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि जीवन ठहरा नहीं—वह आगे बढ़ रहा है, परिष्कृत हो रहा है।
संघर्ष टूटन नहीं, विकास का संकेत है। जैसे धरती के गर्भ में कोयला दबाव सहकर हीरा बनता है, वैसे ही मनुष्य जीवन के दबाव से निखरता है। जो दबाव से भागता है, वह कच्चा रह जाता है; जो दबाव को साध लेता है, वही दमकता है।
सनातन ग्रंथ यह भी सिखाते हैं कि हर रुकावट अंत नहीं, पुनरुत्थान की भूमिका है। महाभारत में पांडवों का जीवन इसका सजीव उदाहरण है—अपमान, वनवास, असहायता और फिर धर्मयुक्त विजय। आपत्ति में स्थिर रहना ही परिपक्व व्यक्तित्व की पहचान है।
आज का युग त्वरित परिणाम चाहता है, पर सनातन मार्ग प्रक्रिया पर विश्वास करना सिखाता है। उपनिषदों का स्वर यही है कि श्रद्धा और धैर्य से किया गया कर्म ही फल देता है। प्रकृति कभी अधूरा निर्माण नहीं करती—वृक्ष समय लेकर फलता है, साधना समय लेकर सिद्धि देती है। व्यक्तित्व भी तपस्या से ही निखरता है।
समय को सनातन में बाधा नहीं, संस्कार माना गया है। ऋषियों की साधना वर्षों चली, तब ब्रह्मज्ञान प्रकट हुआ। गीता का उपदेश है कि मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करता है—अनुशासन, आत्मविश्वास और निरंतर अभ्यास से। इसलिए व्यक्तित्व-विकास में समय लगना असफलता नहीं, गहराई का प्रमाण है।
सनातन धर्म व्यक्तित्व को बाहरी उपलब्धियों से नहीं, आंतरिक संतुलन से मापता है। अहंकाररहित आत्मविश्वास, करुणा, सत्य और विवेक—यही श्रेष्ठ व्यक्तित्व के लक्षण हैं। रामायण में श्रीराम का चरित्र यही सिखाता है—राजा होकर भी विनम्र, शक्तिशाली होकर भी मर्यादित।
इसलिए संघर्ष, रुकावट, धैर्य और समय—ये जीवन की बाधाएँ नहीं, व्यक्तित्व निर्माण के संस्कार हैं।
जब दबाव बढ़े, तो डरिए मत—समझिए कि हीरा बनने की प्रक्रिया चल रही है।
जब संघर्ष आए, तो जानिए कि आप ऊपर उठ रहे हैं।
जब रुकावट मिले, तो समझिए कि वापसी की तैयारी हो रही है।
और जब समय लगे, तो धैर्य रखिए—क्योंकि श्रेष्ठ निर्माण कभी जल्दी नहीं होता।
🚩🌺 सनातन दृष्टि में यही सच्चा व्यक्तित्व विकास है—आत्मा से आत्मबल तक की यात्रा। 🌺🚩
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