ॐ नमः शिवाय — शिव तत्त्व और सनातन चेतना
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ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय… ॐ नमः शिवाय…
सनातन चेतना की जड़ों में यदि कोई शक्ति सबसे गहराई से धड़कती है, तो वह महादेव शिव हैं। शिव किसी सीमित परिभाषा में बंधे देव नहीं हैं। वे न केवल संहार के अधिष्ठाता हैं, बल्कि सृजन की पहली स्पंदन-रेखा और संरक्षण की मौन शक्ति भी हैं। जहाँ कुछ समाप्त होता है, वहीं शिव की उपस्थिति से कुछ नया जन्म लेता है। इसीलिए शिव को केवल “देव” कहना अपूर्ण है—वे स्वयं तत्त्व हैं, स्वयं चेतना हैं।
शिव शब्द स्वयं में एक दर्शन है।
शिव का अर्थ है—जो कल्याण करे, जो अशुद्ध को शुद्ध करे, जो भय को शांति में बदल दे। शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि वह अवस्था है जहाँ मन स्थिर हो जाता है और अहंकार गलने लगता है। शिव का स्मरण करते ही भीतर एक मौन उतरता है—और वही मौन सबसे बड़ा उत्तर बन जाता है।
वेदों की ऋचाओं में शिव रुद्र रूप में प्रकट होते हैं—उग्र भी, करुण भी। यह उग्रता क्रोध नहीं, चेतावनी है; और करुणा दुर्बलता नहीं, दिव्य सामर्थ्य है। रुद्र का शिव-स्वरूप यही सिखाता है कि जीवन में कठोरता और कोमलता दोनों आवश्यक हैं। जो केवल कठोर है, वह टूट जाता है; जो केवल कोमल है, वह बह जाता है। शिव संतुलन हैं।
उपनिषदों की दृष्टि में शिव ब्रह्म हैं—एकमात्र, अद्वितीय, सर्वव्यापी। वे कहीं दूर किसी लोक में नहीं, बल्कि हर कण में, हर श्वास में, हर धड़कन में विद्यमान हैं। जिस क्षण मनुष्य यह जान लेता है कि जिसे वह खोज रहा है, वही उसकी चेतना का मूल है—उसी क्षण द्वैत समाप्त हो जाता है। वही शिव-बोध है।
पुराणों में शिव की महिमा कथाओं के माध्यम से प्रकट होती है। ये कथाएँ इतिहास नहीं, अंतःयात्रा के संकेत हैं। शिवलिंग का अर्थ पत्थर नहीं, बल्कि उस अनंत की याद है जिसका न आरंभ है, न अंत। वह हमें बताता है कि सत्य आकार में नहीं, अनुभूति में है।
शिव को महाकाल कहा गया क्योंकि वे समय से परे हैं। समय सब कुछ निगल लेता है, पर जो समय को देख सकता है—वही महाकाल है। शिव का तांडव विनाश नहीं, जड़ता का टूटना है। जब चेतना जड़ हो जाती है, तब शिव का तांडव आवश्यक हो जाता है।
नीलकंठ का प्रसंग हमें सिखाता है कि सच्ची महानता दिखावे में नहीं, मौन त्याग में होती है। शिव ने विष को न उगला, न निगला—उसे कंठ में रोका। यह जीवन का गूढ़ सूत्र है—हर विष को बाहर फेंकना समाधान नहीं, कुछ को विवेक से थामना ही रक्षा करता है।
शिव आशुतोष हैं—वे गणना नहीं करते, भावना देखते हैं। न विधि पूछते हैं, न भाषा। एक आँसू, एक सच्चा भाव, एक क्षण की प्रामाणिक पुकार—और शिव उपस्थित हो जाते हैं। यही कारण है कि वे दैत्य और देव, बालक और वृद्ध—सबके लिए समान हैं।
सबसे अद्भुत यह है कि शिव योगी भी हैं और गृहस्थ भी। वे यह नहीं सिखाते कि संसार छोड़ो, वे सिखाते हैं कि संसार में रहते हुए बंधन छोड़ो। ध्यान हिमालय में भी हो सकता है और घर के आँगन में भी—यदि भीतर शिव जाग्रत हो।
अंततः, शिव की उपासना पूजा-पद्धति नहीं, स्व-परिवर्तन की प्रक्रिया है।
जहाँ अहंकार गलता है—वहाँ शिव हैं।
जहाँ मौन गहराता है—वहाँ शिव हैं।
जहाँ करुणा बिना कारण बहती है—वहाँ शिव हैं।
महादेव कोई दूर बैठी शक्ति नहीं—वे वही हैं जो आपके भीतर “मैं” के पीछे छिपे हैं।
उन्हें पाना नहीं पड़ता—उन्हें पहचानना पड़ता है।
ॐ नमः शिवाय…
यह मंत्र नहीं, स्मरण है।
यह पुकार नहीं, वापसी है।
हर हर महादेव।
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