सनातन धर्म में शिक्षा को ‘यज्ञ’ क्यों कहा गया
सनातन धर्म में शिक्षा को कभी केवल पढ़ना–लिखना नहीं माना गया। यहाँ शिक्षा को जीवन-निर्माण की प्रक्रिया समझा गया—ऐसी प्रक्रिया जिसमें मनुष्य का अहं गलता है, चेतना परिष्कृत होती है और समाज का संतुलन सुरक्षित रहता है। इसी कारण सनातन परंपरा ने शिक्षा को यज्ञ कहा। यह शब्द मात्र रूपक नहीं है, बल्कि एक गहरे दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य की घोषणा है। जब हम यह पूछते हैं कि शिक्षा को यज्ञ क्यों कहा गया, तो वास्तव में हम यह पूछ रहे होते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है—और सनातन इसका उत्तर अत्यंत स्पष्ट देता है।
यज्ञ का अर्थ केवल अग्नि में आहुति देना नहीं है। यज्ञ का मूल अर्थ है—त्यागपूर्वक किया गया पवित्र कर्म, जो केवल करने वाले के लिए नहीं, बल्कि समष्टि के कल्याण के लिए हो। जहाँ स्वार्थ समाप्त होता है और लोकहित आरंभ होता है, वहीं यज्ञ घटित होता है। इसी कसौटी पर शिक्षा को परखा गया। यदि शिक्षा केवल व्यक्तिगत लाभ, पद, पैसा या सत्ता तक सीमित हो जाए, तो वह सनातन दृष्टि में शिक्षा नहीं रहती—वह केवल कौशल (स्किल) बन जाती है। शिक्षा तभी यज्ञ है, जब उसमें स्वयं का अर्पण हो।
प्राचीन भारत की शिक्षा-व्यवस्था को देखें, तो वहाँ ‘गुरुकुल’ शब्द अपने आप में यह रहस्य खोल देता है। शिष्य गुरु के समीप जाकर रहता था। वह केवल ज्ञान नहीं लेता था—वह अपनी आलस्य, अपनी असभ्यता, अपने अहंकार और अपनी अज्ञानता की आहुति देता था। गुरु उस यज्ञ का होता था यज्ञकर्ता और शिष्य होता था समिधा। शिक्षा की अग्नि में शिष्य का कच्चापन जलता था और परिपक्व मनुष्य का जन्म होता था। यही कारण है कि शिक्षा को यज्ञ कहा गया—क्योंकि उसमें रूपांतरण होता है।
वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि ज्ञान का दान सबसे बड़ा दान है। पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह दान एकतरफ़ा नहीं होता। गुरु भी यज्ञ करता है। वह अपना अनुभव, अपनी साधना, अपना समय और अपनी ऊर्जा शिष्य में अर्पित करता है। वह शिष्य के प्रश्नों के साथ धैर्य रखता है, उसकी गलतियों को सहता है और उसकी अपरिपक्वता को समय देता है। यह भी त्याग है। इसलिए शिक्षा-यज्ञ में केवल शिष्य नहीं, गुरु भी आहुति देता है। दोनों जलते हैं—पर प्रकाश के लिए।
सनातन परंपरा में यज्ञ का एक मूल तत्व है—ऋत। ऋत का अर्थ है ब्रह्मांडीय नियम, सत्य का अनुशासन। शिक्षा का उद्देश्य भी यही था कि मनुष्य ऋत के साथ जीना सीखे। वह प्रकृति के विरुद्ध नहीं, उसके साथ चले। वह समाज को तोड़े नहीं, जोड़े। वह ज्ञान का प्रयोग केवल अपने लिए नहीं, सबके लिए करे। इसीलिए शिक्षा को यज्ञ कहा गया—क्योंकि यज्ञ सिखाता है कि जो कुछ प्राप्त हुआ है, वह लौटाया भी जाना चाहिए।
आज की दृष्टि से देखें तो यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। आधुनिक शिक्षा अधिकतर उपभोग-केंद्रित हो गई है। हम सीखते हैं—कमाने के लिए, जीतने के लिए, आगे निकलने के लिए। पर सनातन शिक्षा अर्पण-केंद्रित थी। वहाँ पूछा जाता था—तुम समाज को क्या दोगे? तुम्हारा ज्ञान किसका कल्याण करेगा? यदि ज्ञान समाज को तोड़ रहा है, शोषण बढ़ा रहा है या अहंकार को पोषित कर रहा है, तो वह ज्ञान नहीं, अविद्या है—और अविद्या यज्ञ नहीं हो सकती।
यज्ञ का एक और गूढ़ तत्व है—अग्नि। अग्नि साक्षी होती है। अग्नि शुद्ध करती है। अग्नि ऊपर की ओर ले जाती है। शिक्षा की अग्नि भी ऐसी ही है। जब कोई शिष्य सत्य के लिए सीखता है, तब उसके भीतर की शिक्षा-अग्नि उसे नीचे नहीं, ऊपर उठाती है। वह केवल भोग नहीं सिखाती, त्याग सिखाती है। केवल अधिकार नहीं, कर्तव्य सिखाती है। यही कारण है कि शिक्षा को यज्ञ कहा गया—क्योंकि वह भीतर की अग्नि को प्रज्वलित करती है।
उपनिषदों में बार-बार यह संकेत मिलता है कि ज्ञान वही है जो बंधनों से मुक्त करे। बंधन चाहे अज्ञान का हो, भय का हो या अहंकार का—शिक्षा का कार्य है उसे काटना। और यह कार्य बिना तपस्या के संभव नहीं। तपस्या का अर्थ है—असुविधा सहना, अनुशासन अपनाना, त्वरित सुख छोड़ना। यही तप शिक्षा-यज्ञ का ईंधन है। बिना तप के शिक्षा केवल मनोरंजन बन जाती है।
महाभारत और अन्य शास्त्रों में गुरु-शिष्य संबंध को देखें, तो वहाँ शिक्षा कभी आसान नहीं दिखाई गई। अर्जुन को भी युद्धभूमि में अपने मोह की आहुति देनी पड़ी। नचिकेता को मृत्यु के द्वार तक जाना पड़ा। यह सब शिक्षा-यज्ञ की प्रक्रियाएँ हैं। शिक्षा वहाँ आराम नहीं देती—वह झकझोरती है। क्योंकि यज्ञ में अग्नि जलती है, और अग्नि शीतल नहीं होती।
सनातन परंपरा में शिक्षा का एक सामाजिक आयाम भी था। शिष्य शिक्षित होकर केवल अपने परिवार के लिए नहीं, पूरे समाज के लिए उत्तरदायी होता था। ब्राह्मण बने तो समाज को दिशा दें, क्षत्रिय बने तो समाज की रक्षा करें, वैश्य बने तो समाज का पोषण करें, और शूद्र बने तो समाज की सेवा में गरिमा लाएँ। यह विभाजन श्रेष्ठता का नहीं, कर्तव्य का था। शिक्षा यज्ञ इसलिए थी, क्योंकि उसका फल समाज को समर्पित होता था।
आज जब हम शिक्षा को तनाव, प्रतिस्पर्धा और आत्मकेंद्रित सफलता का माध्यम बना चुके हैं, तब “शिक्षा = यज्ञ” की अवधारणा और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें याद दिलाती है कि सीखना केवल लेना नहीं है। सीखना जलना भी है। अपने भीतर के अज्ञान, आलस्य और अहंकार को अग्नि में डालना भी है। यदि यह नहीं हो रहा, तो शिक्षा केवल प्रमाणपत्र है—यज्ञ नहीं।
सनातन दृष्टि में सबसे बड़ा यज्ञ वही है, जिसमें मनुष्य स्वयं आहुति बने। शिक्षा वही यज्ञ है, जिसमें व्यक्ति अपने सीमित ‘मैं’ को व्यापक ‘हम’ में विसर्जित करता है। इसी कारण ऋषियों ने कहा—विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन, और धन से धर्म। यह पूरी श्रृंखला यज्ञ-संस्कृति पर आधारित है।
अंततः, सनातन धर्म में शिक्षा को यज्ञ इसलिए कहा गया क्योंकि शिक्षा का लक्ष्य नौकरी नहीं, निर्माण था; लाभ नहीं, लोककल्याण था; सूचना नहीं, बोध था। यज्ञ में धुआँ ऊपर उठता है—शिक्षा में चेतना। और जब शिक्षा यज्ञ बनती है, तब व्यक्ति केवल शिक्षित नहीं होता—वह उत्तरदायी, संतुलित और जाग्रत मनुष्य बनता है। यही सनातन परंपरा का मूल संदेश है, और यही कारण है कि यहाँ शिक्षा को यज्ञ कहा गया।
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