अन्य देवताओं की तरह भगवान ब्रह्मा की पूजा क्यों नहीं होती? — सनातन दृष्टि
सनातन धर्म में सृष्टि को समझने के लिए त्रिदेव की अवधारणा दी गई—सृजन, पालन और लय। इस त्रिमूर्ति में सृजन का दायित्व भगवान ब्रह्मा को सौंपा गया। वे लोकपितामह हैं, स्वयंभू हैं, और चार मुखों से चारों दिशाओं में वेद-वाणी का प्रसार करने वाले हैं। फिर भी प्रश्न उठता है कि जहाँ भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा सर्वत्र होती है, वहाँ ब्रह्मा की प्रतिमा-पूजा सीमित क्यों है?
इसका उत्तर किसी एक कारण में नहीं, बल्कि धर्म, कथा और दर्शन—तीनों के संतुलन में छिपा है।
सनातन परंपरा में ब्रह्मा की अमूर्त उपासना अधिक प्रचलित रही है। वास्तु, यज्ञ, मंडल, चक्र और विधानों में ब्रह्मा का स्थान केंद्र में माना गया—क्योंकि सृजन का सूत्र केंद्र से ही फूटता है। यज्ञों में ‘ब्रह्मा ऋत्विज्’ की भूमिका यही दर्शाती है कि सृजन का निरीक्षण और संतुलन ब्रह्मा-तत्त्व करता है। इसीलिए मंदिर-प्रतिमा से अधिक विधान और कर्मकांड में ब्रह्मा की उपस्थिति मानी गई।
प्रतिमा-पूजा के संदर्भ में एक प्रसिद्ध पुराणकथा मिलती है, जिसका उल्लेख पद्म पुराण के सृष्टिखंड में आता है। कथा के अनुसार पुष्कर में यज्ञ के समय पत्नी की अनुपस्थिति में यज्ञ आरंभ कराने की विवशता से एक असाधारण स्थिति बनी। बाद में उत्पन्न भावनात्मक टकराव के कारण यह मान्यता स्थापित हुई कि ब्रह्मा की प्रतिमा-पूजा कुछ विशेष स्थलों तक सीमित रहे। यह कथा निषेध नहीं, प्रतीक है—जो बताती है कि सृजन-तत्त्व का कार्य पूर्ण होने के बाद वह स्वयं पृष्ठभूमि में चला जाता है।
इसी कारण आज भी ब्रह्मा के प्रमुख मंदिर गिने-चुने हैं—जैसे पुष्कर और ब्रह्मावर्त क्षेत्र। पर इससे ब्रह्मा का महत्व कम नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है।
क्योंकि ब्रह्मा ही वह कड़ी हैं जिनसे वेद, पुराण और भागवत परंपरा प्रवाहित हुई। शेषशायी विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा का प्राकट्य, फिर तपस्या द्वारा ‘चतु:श्लोकी भागवत’ का बोध—और वही ज्ञान नारद, व्यास और शुकदेव तक पहुँचना—यह दर्शाता है कि ज्ञान की परंपरा का मूल स्रोत ब्रह्मा हैं।
चार वेदों का प्राकट्य, उपवेदों और इतिहास–पुराण (पंचम वेद) की परंपरा, यज्ञ-विधान, ऋत्विजों की व्यवस्था—यह सब ब्रह्मा-तत्त्व से ही निकला है। यहाँ तक कि देवता और असुर—दोनों—वरदान के लिए प्रायः ब्रह्मा की ही शरण में जाते हैं। सृजन में लगे होने के कारण वे कठिन तप से ही प्रसन्न होते हैं—यह भी उनके तत्त्व की विशेषता है।
जब पृथ्वी अधर्म से पीड़ित होती है या देवता संकट में पड़ते हैं, तो वे ब्रह्मा के पास जाते हैं—और ब्रह्मा विष्णु की स्तुति कर अवतार-कार्य का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस प्रकार अनेक अवतारों के निमित्त ब्रह्मा ही बनते हैं।
तो फिर पूजा क्यों सीमित? क्योंकि सनातन दर्शन में सृजन का तत्त्व दिखने से अधिक कार्य में माना गया। ब्रह्मा का कार्य सृष्टि को चलाना है, अपने लिए पूजा बटोरना नहीं। वे ‘विधाता’ हैं—नियम बनाने वाले—और नियम बनाने वाला स्वयं नियमों से बँधता नहीं।
इसलिए ब्रह्मा की पूजा यज्ञ, वेद-पाठ, ज्ञान और कर्तव्य के माध्यम से होती है—प्रतिमा की अपेक्षा प्रक्रिया में।
निष्कर्ष
भगवान ब्रह्मा की पूजा न होना उनका तिरस्कार नहीं, बल्कि सनातन की सूक्ष्म समझ है। जहाँ विष्णु जीवन को संभालते हैं और शिव जीवन को मुक्त करते हैं, वहाँ ब्रह्मा जीवन की रचना करते हैं—और रचना करने वाला अक्सर पर्दे के पीछे रहता है।
इसीलिए ब्रह्मा त्रिदेवों में प्रथम हैं—लोकपितामह हैं—और ज्ञान, वेद व विधि के मूल स्रोत हैं।
पूजा सीमित है, पर प्रभाव सर्वव्यापी।
🌺🙏 जय श्री राधे 🙏🌺
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