स्वर्ग से बड़ा साथी: 'तु ना रिं' के साथ जानिए क्यों युधिष्ठिर ने मोक्ष के द्वार पर भी अपना धर्म नहीं छोड़ा।
महाभारत की सबसे सच्ची, सबसे शांत और सबसे कठोर कथा है — युधिष्ठिर और कुत्ते की कथा। इसमें न युद्ध है, न शस्त्र, न चमत्कार। इसमें केवल धर्म है — निर्वस्त्र, निर्विवाद और निर्विकार।
महायुद्ध समाप्त हो चुका था। पांडव विजयी थे, पर विजय में आनंद नहीं था। द्रौपदी जा चुकी थीं, अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव — एक-एक कर सब मार्ग में गिरते गए। अंत में केवल युधिष्ठिर शेष थे। उनके साथ एक साधारण सा कुत्ता चल रहा था। न कोई परिचय, न कोई महिमा। बस साथ।
जब युधिष्ठिर स्वर्ग के द्वार पर पहुँचे, तब देवराज इंद्र ने उनसे कहा — “राजन, आप सशरीर स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हैं, पर यह कुत्ता नहीं।” युधिष्ठिर रुके। यह वही क्षण है जहाँ महाभारत समाप्त नहीं होती — यहीं से उसका सार आरंभ होता है।
युधिष्ठिर ने कहा — “मैं अपने साथ आए इस प्राणी को नहीं छोड़ सकता। जिसने संकट में मेरा साथ नहीं छोड़ा, उसे मैं सुख में कैसे त्याग दूँ?”
इंद्र ने समझाया — “स्वर्ग में पशुओं का स्थान नहीं है।” युधिष्ठिर शांत रहे और बोले — “यदि स्वर्ग की शर्त यह है कि मैं किसी आश्रित को त्याग दूँ, तो ऐसा स्वर्ग मुझे स्वीकार नहीं।”
यह वाक्य महाभारत का सबसे बड़ा सत्य है। यहाँ युधिष्ठिर ने न राज्य चुना, न भाई, न स्वर्ग — उन्होंने धर्म चुना।
तभी वह कुत्ता विलीन हो गया और धर्म स्वयं अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। उन्होंने कहा — “वत्स, मैंने तुझे परखने के लिए यह रूप धारण किया था। तूने जीवन भर सत्य कहा, पर आज तूने सत्य को जिया।”
युधिष्ठिर ही एकमात्र व्यक्ति थे जिन्होंने बिना किसी शर्त, बिना किसी लाभ, बिना किसी भय के धर्म को चुना। इसलिए उन्हें स्वर्ग नहीं दिया गया — स्वर्ग उनके पीछे चला।
महाभारत की यह कथा बताती है कि धर्म परीक्षा में नहीं, त्याग में पहचाना जाता है। जो अपने साथ चलने वाले को अंतिम क्षण में छोड़ दे — वह चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, धर्म से छोटा रह जाता है।
यही कारण है कि युधिष्ठिर को “धर्मराज” कहा गया — क्योंकि उन्होंने कभी धर्म को अपने पक्ष में नहीं मोड़ा, बल्कि स्वयं को धर्म के पक्ष में मोड़ा।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें