अश्वत्थामा का श्राप
(विजय के बाद भी जो कभी नहीं जी पाया)
युद्ध खत्म हो चुका था। कुरुक्षेत्र शांत था, पर यह शांति सुकून वाली नहीं थी— यह थकान से भरी थी।
कौरव हार चुके थे। पांडव जीत गए थे।
और उन दोनों के बीच एक आदमी खड़ा था जो न जीत सका, न हार सका— अश्वत्थामा।
वह रात, जिसे लोग “विजय” कहते हैं
उस रात अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर में घुसकर जो किया— उसे इतिहास “प्रतिशोध” कहता है।
पर सच यह है— वह प्रतिशोध नहीं था। वह टूटा हुआ मन था। पिता मारे गए थे। गुरु अपमानित हो चुके थे। राजा मृत्युशैया पर था।
अश्वत्थामा के पास खोने को कुछ नहीं बचा था। और जब इंसान के पास कुछ नहीं बचता— वह सबसे खतरनाक हो जाता है।
सुबह हुई… और जीत का अर्थ बदल गया
जब सूरज निकला, तो पांडवों ने देखा— उनके पुत्र मारे जा चुके थे। नींद में। निहत्थे। यह युद्ध नहीं था। यह हत्या थी। और पहली बार कृष्ण की आँखों में क्रोध था।
ब्रह्मास्त्र और भय
अश्वत्थामा भाग रहा था। पीछे अर्जुन। डर में उसने ब्रह्मास्त्र चला दिया— बिना यह जाने कि उसे वापस कैसे लिया जाता है। यह कोई योद्धा का निर्णय नहीं था। यह घबराए हुए बच्चे का निर्णय था।
कृष्ण ने कहा— “अस्त्र वापस लो।” अर्जुन जानता था कैसे। अश्वत्थामा नहीं।
वह क्षण, जहाँ सब खत्म हो गया
जब सब शांत हुआ, तो कृष्ण ने अश्वत्थामा की ओर देखा। उन्होंने उसे मारा नहीं। उन्होंने उससे उसकी मणि छीन ली। और कहा—
“तुम मरोगे नहीं। यही तुम्हारा दंड है।”
यही था असली श्राप
लोग समझते हैं अमर होना वरदान है। नहीं। अमर होना सबसे बड़ा श्राप है जब—
- तुम्हारे पास कोई नहीं बचा
- तुम्हें माफ़ करने वाला कोई नहीं
- और तुम्हारे अपराध हर दिन तुम्हारे साथ जागते हों
अश्वत्थामा को मरने नहीं दिया गया। उसे याद रखने के लिए छोड़ा गया।
न कोई राज्य, न कोई मृत्यु
वह न राजा बना। न संन्यासी। वह बस चलता रहा— युगों से। घावों के साथ। यादों के साथ। और उस प्रश्न के साथ जिसका उत्तर कभी नहीं मिलता—
“अगर उस रात मैंने ऐसा न किया होता…?”
इंसानी सच
अश्वत्थामा राक्षस नहीं था। वह अत्यधिक टूटा हुआ इंसान था। और महाभारत हमें यह सिखाती है—
हर अपराधी जन्म से अधर्मी नहीं होता। कभी-कभी वह बस समय पर संभाला नहीं गया होता।
अंत में
युद्ध पांडव जीत गए। कौरव हार गए। पर अश्वत्थामा? वह आज भी कहीं जीत और हार के बीच भटक रहा है। और यही सबसे बड़ी सज़ा है।
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