युधिष्ठिर का सत्य: जब सत्य ही पाप बन गया
— वह वाक्य, जिसने गुरु द्रोण को तोड़ा और युद्ध को पलट दिया
कुरुक्षेत्र का पंद्रहवाँ दिन। रणभूमि पर शस्त्रों की गर्जना थी, पर उससे भी ऊँची एक दीवार खड़ी थी—द्रोणाचार्य।
जब तक द्रोण जीवित थे, पांडवों की जीत केवल आशा थी। वे अजेय थे—क्योंकि वे लड़ते नहीं थे, वे शिक्षा देते हुए युद्ध करते थे।
कृष्ण का उपाय: शस्त्र नहीं, मन
श्रीकृष्ण जानते थे—द्रोण को परास्त करने का मार्ग शरीर से नहीं, मन से होकर जाता है।
कृष्ण ने कहा—“द्रोण शस्त्र तभी छोड़ेंगे जब उन्हें लगेगा कि उनका पुत्र नहीं रहा।”
पुत्र—अश्वत्थामा।
योजना बनी। पर समस्या भी वहीं थी।
सत्य का द्वार और युधिष्ठिर
कृष्ण ने वह कार्य युधिष्ठिर को सौंपा—क्योंकि उनका सत्य अटूट माना जाता था।
द्रोण केवल युधिष्ठिर के वचन पर विश्वास करते थे।
योजना थी—“अश्वत्थामा मारा गया।”
पर सत्य क्या था? मारा गया था एक हाथी, जिसका नाम अश्वत्थामा था।
युधिष्ठिर से कहा गया—“अश्वत्थामा हतो— नरो वा कुंजरो वा।”
वह क्षण, जब सत्य काँप गया
युधिष्ठिर बोले—“अश्वत्थामा मारा गया है…”
और फिर—धीमे स्वर में—“…नर नहीं, कुंजर।”
यह वाक्य सत्य था। पर पूर्ण नहीं।
यही वह क्षण था जब सत्य अपने ही भार से टूट गया।
द्रोण ने सुना—पर उनका मन केवल पहले शब्द पर टिक गया।
पुत्रशोक ने उनका धनुष गिरा दिया।
और उसी क्षण—धृष्टद्युम्न का प्रहार हुआ।
क्या युधिष्ठिर ने झूठ बोला?
यह प्रश्न हज़ारों वर्षों से पूछा जा रहा है।
उत्तर सरल नहीं।
युधिष्ठिर ने झूठ नहीं बोला। पर उन्होंने सत्य को पूरा नहीं होने दिया।
यही कारण है कि उस दिन उनका रथ, जो सदा पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर रहता था—धरती को छू गया।
यह कोई दंड नहीं था। यह संकेत था।
कि धर्म केवल शब्दों से नहीं, भाव से भी मापा जाता है।
कृष्ण का मौन और धर्म का भार
कृष्ण ने युधिष्ठिर को रोका नहीं।
क्योंकि युद्ध केवल आदर्शों से नहीं जीता जाता। कभी-कभी धर्म को बचाने के लिए धर्म की धार कुंद करनी पड़ती है।
यह अधर्म नहीं था—यह कालधर्म था।
निष्कर्ष
द्रोण का पतन शस्त्र से नहीं हुआ। वह हुआ—
पुत्रमोह से
अपूर्ण सत्य से
और समय की अनिवार्यता से
महाभारत हमें सिखाता है—
“सत्य यदि करुणा से रहित हो, तो वह भी हिंसा बन सकता है। और सत्य यदि समय से कट जाए, तो वह धर्म नहीं रहता।”
युधिष्ठिर धर्मराज थे। पर उस दिन उन्होंने जाना—कि धर्म का भार सिंहासन से भी भारी होता है।
सनातनी मर्म:
"यह प्रसंग हमें 'Intent over Content' (कथनी से अधिक मंशा) का पाठ पढ़ाता है। युधिष्ठिर का रथ इसलिए नहीं गिरा क्योंकि उन्होंने झूठ बोला, बल्कि इसलिए गिरा क्योंकि उन्होंने 'सत्य' को एक 'वध' का माध्यम बनाया।"
धर्म अत्यंत सूक्ष्म है; यहाँ केवल यह महत्वपूर्ण नहीं कि आप 'क्या' कह रहे हैं, बल्कि यह अधिक महत्वपूर्ण है कि आप 'क्यों' कह रहे हैं। याद रखें, एक पवित्र झूठ कभी-कभी एक हिंसक सत्य से अधिक धार्मिक हो सकता है, लेकिन उसकी कीमत व्यक्ति को अपनी 'साख' देकर चुकानी पड़ती है।

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