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मौन की प्रतीक्षा — जहाँ ईश्वर स्वयं प्रकट होते हैं | Sanatan Samvad

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मौन की प्रतीक्षा — जहाँ ईश्वर स्वयं प्रकट होते हैं | Sanatan Samvad

मौन की प्रतीक्षा — जहाँ ईश्वर स्वयं प्रकट होते हैं

Silent Devotion

यह कथा उस भक्ति की है जो शब्दों से नहीं, मौन से बोली जाती है—जहाँ पुकार नहीं होती, केवल प्रतीक्षा होती है।

एक पुराने नगर के किनारे एक छोटा सा मंदिर था। टूटी हुई सीढ़ियाँ, झरता हुआ पलस्तर और भीतर एक शांत, सूना गर्भगृह। वर्षों से वहाँ कोई पुजारी नहीं था, कोई घंटा नहीं बजता था। लोग कहते थे—“यह मंदिर अब खाली है।” पर एक स्त्री थी, जो ऐसा नहीं मानती थी।

वह प्रतिदिन संध्या के समय वहाँ आती। न दीप लाती, न फूल, न नैवेद्य। बस मंदिर की देहरी पर बैठ जाती और भीतर की शून्यता को देखती रहती। कभी-कभी आँखें मूँद लेती, कभी बस साँसों की गति सुनती। यदि कोई पूछता कि वह क्या करती है, तो वह कहती—“मैं प्रतीक्षा करती हूँ।”

उसका जीवन कठिन था। पति का देहांत हो चुका था, संतान दूर रहती थी, और दिन भर का श्रम उसे थका देता था। पर वह कभी किसी से कुछ नहीं कहती। बस हर शाम मंदिर आकर बैठ जाती—मौन में।

कई दिन बीत गए। कई महीने। ऋतुएँ बदलीं। लोग आते-जाते रहे, पर वह स्त्री वहीं रही। न शिकायत, न माँग, न आँसू—केवल प्रतीक्षा।

एक रात भयंकर ठंड पड़ी। आकाश में तारे साफ़ थे, हवा में सन्नाटा था। वह स्त्री देर तक बैठी रही। शरीर काँप रहा था, पर उठने का मन नहीं हुआ। उसने आँखें मूँदीं और बस इतना सोचा—“आज भी यहीं बैठूँगी।”

तभी उसे लगा जैसे मंदिर के भीतर कोई हलचल हुई हो। कोई आहट नहीं, कोई शब्द नहीं—बस एक उपस्थिति। उसने आँखें नहीं खोलीं। न डर, न उत्सुकता—बस वही मौन।

कुछ क्षण बाद एक बहुत कोमल स्वर आया— “तुम रोज़ यहाँ क्यों आती हो?”

उसने बिना आँख खोले उत्तर दिया, “क्योंकि आप यहीं मिलते हैं।”

स्वर फिर आया, “मैं तो कभी दिखा नहीं।”

स्त्री हल्की मुस्कुराई। “जिसे देखना हो, उसे दिखना ज़रूरी नहीं।”

मौन छा गया। फिर उसने महसूस किया कि किसी ने उसके पास आकर बैठकर भी वही मौन ओढ़ लिया है—न प्रश्न, न उत्तर। बस साथ।

कुछ देर बाद वही स्वर बोला, “तुमने कभी कुछ माँगा नहीं।”

स्त्री ने धीरे से कहा, “जिसके पास आप हों, वह माँगे भी तो क्या?”

तभी उसने आँखें खोलीं।

गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं थी, पर वहाँ श्यामल प्रकाश था—न तेज़, न धुंधला। उसी प्रकाश में वह समझ गई कि सामने कौन है। वह कोई और नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण थे—जो सबसे अधिक वहीं प्रकट होते हैं, जहाँ कोई उन्हें बुलाता नहीं, बस इंतज़ार करता है।

कृष्ण ने कहा, “लोग मुझे पुकारते हैं, मंत्रों से बाँधते हैं, याचना करते हैं। पर तुम… तुमने मुझे मौन से थाम लिया।”

स्त्री की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कहा, “मैं बोलती तो टूट जाती। इसलिए चुप रही।”

कृष्ण ने स्नेह से उत्तर दिया, “इसीलिए मैं आया। जहाँ शब्द टूटते हैं, वहीं मैं बोलता हूँ।”

कहते हैं, उस रात के बाद वह स्त्री फिर कभी मंदिर नहीं आई। लोग समझे—वह थक गई होगी। पर सच यह था कि जिसे एक बार उत्तर मिल जाए, उसे प्रतीक्षा की आवश्यकता नहीं रहती।

और उस मंदिर के बारे में लोग कहते हैं—वहाँ आज भी कोई नहीं रहता, फिर भी वहाँ बैठते ही मन अपने आप शांत हो जाता है। क्योंकि जहाँ कभी किसी ने मौन से ईश्वर की प्रतीक्षा की हो, वहाँ ईश्वर का ठहराव रह ही जाता है।

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