नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस ऋषि की कथा सुनाने आया हूँ जिनका जन्म ही वैराग्य था, जिनकी वाणी से भक्ति अमृत बनकर बही, और जिनकी उपस्थिति में मृत्यु भी भय नहीं रह गई—आज मैं तुम्हें महर्षि शुकदेव की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक|
महर्षि शुकदेव की सम्पूर्ण कथा | Sanatan Samvad
महर्षि शुकदेव का जन्म महर्षि वेदव्यास के तप से प्रकट हुआ—ऐसा जन्म जिसमें देह से पहले चेतना जागी। कहा जाता है कि शुक जन्म लेते ही वन की ओर चल पड़े, जैसे संसार उनके भीतर पहले ही समाप्त हो चुका हो। वे शिशु नहीं थे, वे शुद्ध साक्षी थे—न मोह, न भय, न आसक्ति। वन, नदी, आकाश—सब उनके लिए एक ही ब्रह्म-धारा के रूप थे। व्यास ने पुत्र को पुकारा, पर शुक की चाल नहीं रुकी; तब व्यास ने उपनिषदों के मंत्र गाए—और वही मंत्र प्रतिध्वनि बनकर शुक के भीतर लौट आए। यह संकेत था कि शुक का गुरु कोई व्यक्ति नहीं, स्वयं ब्रह्मज्ञान है।
शुकदेव का जीवन शब्दों से कम और अनुभूति से अधिक बना। वे नग्न रहते—लज्जा के अभाव से नहीं, द्वैत के अभाव से। उनके लिए ‘मैं’ और ‘दूसरा’ का भेद शेष नहीं था। वे जहाँ बैठते, वहाँ शांति उतरती; जहाँ बोलते, वहाँ अर्थ स्थिर होता। उनका मौन उपदेश था—और उनका उपदेश मौन की ओर ले जाता था। वे कहते थे कि जिसे कुछ पाना नहीं, वही सब दे सकता है। इसी कारण उनकी वाणी में आग्रह नहीं, आमंत्रण था।
व्यास ने उन्हें बहुत कुछ देना चाहा, पर शुक को कुछ चाहिए नहीं था। फिर भी लोक-करुणा ने उन्हें रोका। वही करुणा उन्हें राजा परीक्षित के समीप ले गई—जहाँ मृत्यु निकट थी और भय का अवसर था। शुक ने भय को कथा में बदल दिया। सात दिनों तक उन्होंने भागवत का अमृत बहाया—जहाँ ईश्वर कथा नहीं, सान्निध्य बन गया; जहाँ कर्म बोझ नहीं, सेवा बना; और जहाँ भक्ति संकीर्ण नहीं, व्यापक हुई। शुक ने बताया कि ईश्वर दूर नहीं—वह स्मरण में निकट है; और मृत्यु अंत नहीं—वह पूर्णता का द्वार है।
शुकदेव की वाणी सरल थी, पर गहराई अथाह। वे लीला सुनाते, पर उद्देश्य ज्ञान का होता; वे भक्ति जगाते, पर विवेक के साथ। कृष्ण-कथा उनके मुख से बहती तो उसमें करुणा की मिठास होती और सत्य की दृढ़ता। वे कहते थे कि जो प्रेम करता है, वही समझता है; और जो समझता है, वही मुक्त होता है। उनके लिए भक्ति पलायन नहीं, साक्षात्कार थी—जीवन के बीचों-बीच ब्रह्म से मिलन।
शुकदेव किसी आश्रम में नहीं टिके। वे लोक-लोक घूमे—पर लोक से बँधे नहीं। उनका आहार न्यूनतम, विहार स्वाभाविक, और आचरण पारदर्शी था। जहाँ अहंकार दिखता, वे मुस्कुराते; जहाँ जिज्ञासा दिखती, वे ठहरते। उनके पास प्रश्न भी पिघल जाते—क्योंकि उत्तर पहले से उपस्थित होता। शुकदेव किसी परंपरा को नहीं तोड़ते थे; वे उसके भीतर की जड़ता को ढीला करते थे—ताकि धर्म सांस ले सके।
उनका देहावसान भी उसी सहजता से हुआ जैसे उनका जीवन। कहा जाता है कि उन्होंने देह छोड़ी नहीं—देह उनसे छूट गई। एक दिन वे नदी-तट पर ध्यानस्थ थे—श्वास शून्य-सी, मन आकाश-सा, और चेतना पूर्ण। शिष्य देख रहे थे, पर दृश्य बदल गया—जैसे कथा का अंतिम श्लोक मौन बन जाए। शुकदेव ब्रह्म-चेतना में विलीन हो गए—न किसी घोषणा के साथ, न किसी स्मारक के साथ—क्योंकि जो स्वयं अमृत हो, उसे चिन्हों की आवश्यकता नहीं होती।
महर्षि शुकदेव का संदेश आज भी उतना ही जीवित है—डरो मत, स्मरण करो; जकड़ो मत, प्रेम करो; और जीवन को कथा की तरह जियो—जहाँ हर अध्याय अर्थ से भरा हो।
सनातनी मर्म:
"शुकदेव जी का जीवन हमें 'Detached Involvement' (निर्लिप्त जुड़ाव) का पाठ पढ़ाता है। वे नग्न थे क्योंकि उन्हें छिपाने के लिए 'अहंकार' नहीं था।"
आज के युग में, जब हम अपनी पहचान (Identity) और वस्तुओं (Possessions) के पीछे भाग रहे हैं, शुकदेव हमें याद दिलाते हैं कि असली स्वतंत्रता 'इकट्ठा' करने में नहीं, बल्कि 'हल्का' होने में है। जब आप भीतर से भर जाते हैं, तो बाहर की शून्यता आपको डराती नहीं, बल्कि आनंद देती है।

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