ऋषियों की चेतना से लोकजीवन तक ऋषियों की चेतना से लोकजीवन तक हिन्दू धर्म के इतिहास को यदि केवल तिथियों और सभ्यताओं में बाँध दिया जाए, तो उसका प्राण छूट जाता है। क्योंकि यह परंपरा किसी राजवंश या शासन से नहीं, बल्कि ऋषियों की अनुभूति और जनसामान्य …
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