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ऋषियों की चेतना से लोकजीवन तक

ऋषियों की चेतना से लोकजीवन तक

ऋषियों की चेतना से लोकजीवन तक

Sanatan Dharma

हिन्दू धर्म के इतिहास को यदि केवल तिथियों और सभ्यताओं में बाँध दिया जाए, तो उसका प्राण छूट जाता है। क्योंकि यह परंपरा किसी राजवंश या शासन से नहीं, बल्कि ऋषियों की अनुभूति और जनसामान्य के जीवन से बनी है। पिछले लेख में हमने उसके प्रारंभिक प्रवाह और सात ऐतिहासिक चरणों की रूपरेखा देखी थी। अब आगे, उस सूक्ष्म यात्रा को समझना आवश्यक है, जहाँ हिन्दू धर्म ग्रंथ से जीवन और जीवन से दर्शन बना।

ऋषि केवल तपस्वी नहीं थे, वे समाज के द्रष्टा थे। जंगलों में रहने वाले ये मुनि मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष को देखते थे — जन्म, विवाह, मृत्यु, भय, आशा, प्रकृति, ऋतु, आकाश और आत्मा। यही कारण है कि हिन्दू धर्म का ज्ञान किसी एक पुस्तक तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संस्कार, परंपरा और व्यवहार में उतर गया। गुरु–शिष्य परंपरा, गुरुकुल व्यवस्था और मौखिक शिक्षा ने इस धर्म को स्थिर नहीं, बल्कि जीवित रखा।

समय के साथ जब समाज बढ़ा, तो धर्म भी बदला — पर टूटा नहीं। वैदिक यज्ञों के साथ-साथ गृहस्थ जीवन के नियम बने। जन्म से मृत्यु तक सोलह संस्कार विकसित हुए, ताकि मनुष्य का जीवन केवल भोग नहीं, बल्कि यात्रा बने। यही वह बिंदु था जहाँ धर्म मंदिरों से पहले घर में प्रवेश करता है। अग्नि, जल, सूर्य और पृथ्वी — ये केवल देवता नहीं रहे, बल्कि दैनिक जीवन के साक्षी बने।

जैसे-जैसे जनसंख्या और भूगोल फैला, वैसे-वैसे हिन्दू धर्म ने स्थानीय रूप धारण किए। कहीं वह शैव बना, कहीं वैष्णव, कहीं शक्ति की उपासना प्रमुख हुई। पर मूल तत्व वही रहा — धर्म, कर्म और मोक्ष। यह विविधता किसी विभाजन का संकेत नहीं, बल्कि इस परंपरा की सहिष्णुता का प्रमाण है। इसी कारण एक ही भूमि पर अनेक दर्शन, अनेक मार्ग और अनेक साधन एक साथ पनपे।

इस काल में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह भी हुआ कि धर्म केवल ऋषियों और ब्राह्मणों तक सीमित नहीं रहा। कथाएँ, लोकगीत, पर्व और उत्सव बने। रामकथा और कृष्णलीला केवल ग्रंथों में नहीं, बल्कि लोक की आत्मा में बस गईं। यही कारण है कि हिन्दू धर्म पढ़ा नहीं जाता, जिया जाता है। गाँव का किसान, नगर का व्यापारी और वन का तपस्वी — तीनों अपने-अपने ढंग से उसी सत्य से जुड़े रहे।

विदेशी आक्रमणों और राजनीतिक उथल-पुथल के बीच भी यह परंपरा इसलिए नहीं टूटी, क्योंकि इसका आधार पत्थर की इमारतें नहीं, बल्कि स्मृति और संस्कार थे। जब विश्वविद्यालय जले, तब भी मंत्र जीवित रहे; जब मंदिर टूटे, तब भी पूजा हृदय में चलती रही। यही वह रहस्य है जिसे आधुनिक इतिहास अक्सर समझ नहीं पाता।

आज के युग में जब हिन्दू धर्म को केवल पहचान, राजनीति या बहस तक सीमित किया जाता है, तब उसके इतिहास की यह गहराई और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह धर्म न तो अतीत की वस्तु है, न ही जड़ परंपरा। यह एक निरंतर चलती साधना है, जो हर युग में मनुष्य से यही प्रश्न पूछती है — तू कौन है, और तेरा कर्तव्य क्या है?

यही हिन्दू धर्म का इतिहास है — कोई सीधी रेखा नहीं, बल्कि एक चक्र, जो बार-बार घूमता है, पर हर बार नई चेतना के साथ।

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