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संतुलन — क्यों सनातन धर्म अतिवाद नहीं, स्थिरता सिखाता है

संतुलन — क्यों सनातन धर्म अतिवाद नहीं, स्थिरता सिखाता है

संतुलन — सनातन का सबसे कठिन और सबसे आवश्यक सूत्र

Santulan in Sanatan Dharma – balance between bhog and tyag in Hindu philosophy

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें सनातन धर्म की उस शिक्षा के बारे में बताने आया हूँ जो सबसे सरल लगती है, पर पालन सबसे कठिन है — संतुलन।

सनातन कभी अतिवाद नहीं सिखाता। न पूर्ण भोग, न पूर्ण त्याग। न अंधविश्वास, न नास्तिक हठ।

सनातन कहता है — बीच का मार्ग ही सत्य का मार्ग है।

इसीलिए हमारे यहाँ गृहस्थ भी पूज्य है और संन्यासी भी। राजा भी धर्मात्मा हो सकता है और वनवासी भी ज्ञानी।

संतुलन का अर्थ है — काम करो, पर आसक्त मत हो। प्रेम करो, पर अधिकार मत जमाओ। कमाओ, पर लोभ मत पालो। लड़ो, पर द्वेष मत रखो।

कृष्ण का जीवन संतुलन का सबसे बड़ा उदाहरण है। वे युद्धभूमि में भी थे, और रासलीला में भी। राजनीति भी जानते थे, और ध्यान भी।

सनातन समझता है — मनुष्य चरम पर जाता है, इसलिए गिरता है। जो संतुलित रहता है, वह टिकता है।

आज की दुनिया या तो भोग में डूबी है, या कट्टर त्याग में। दोनों में अशांति है।

संतुलन शांति देता है। और शांति से ही विवेक जन्म लेता है।

सनातन में कहा गया — “जो स्वयं को जान ले, वह सीमा में रहता है।”

सीमा बंधन नहीं, सीमा सुरक्षा है।

नदी भी तभी बहती है जब किनारे हों। और जीवन भी तभी बहता है जब मर्यादा हो।

सनातन इसलिए शाश्वत है क्योंकि वह मनुष्य को तोड़ता नहीं, संभालता है।

और जो संभल गया, वही वास्तव में आगे बढ़ा।

🌿 श्रृंखला: सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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