मृत्यु — अंत नहीं, चेतना की यात्रा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस सत्य की ओर ले जाना चाहता हूँ जिससे मनुष्य सबसे अधिक डरता है मृत्यु।
सनातन धर्म मृत्यु को समाप्ति नहीं कहता। वह इसे परिवर्तन कहता है।
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया लेती है।
मृत्यु कोई शत्रु नहीं, मृत्यु एक द्वार है। जिससे आत्मा अपने कर्मों के अनुसार अगली यात्रा में प्रवेश करती है।
इसलिए सनातन में श्मशान डर का नहीं, विवेक का स्थान है। वहाँ खड़े होकर मनुष्य को पहली बार अपनी अस्थिरता दिखती है।
ऋषि कहते थे मृत्यु को जो समझ गया, वह जीवन को डर के बिना जी सकता है।
क्योंकि डर केवल अज्ञान से जन्मता है।
सनातन मृत्यु को अंधकार नहीं, प्रकाश की ओर एक कदम मानता है।
इसलिए हम शव को नहीं रोते, हम आत्मा की यात्रा को शांति से विदा करते हैं।
मंत्र पढ़े जाते हैं, अग्नि साक्षी बनती है, और आत्मा अपनी अगली दिशा में चल पड़ती है।
मृत्यु का सबसे बड़ा रहस्य यह है जो जीवन भर सचेत रहा, उसके लिए मृत्यु केवल दरवाज़ा बदलना है।
और जो जीवन भर भ्रम में रहा, उसके लिए मृत्यु भी भ्रम बन जाती है।
इसलिए सनातन कहता है डरो मत। जियो। समझो। और जब समय आए, शांत मन से आगे बढ़ो।
क्योंकि यात्रा समाप्त नहीं होती, केवल वाहन बदलता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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