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धर्म का उद्देश्य है भयमुक्त समाज

A spiritual graphic representing 'Abhaya' (fearlessness), showing a calm human figure standing steady amidst a chaotic storm, symbolizing the power of Dharma

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस सत्य को स्पष्ट करने आया हूँ जिसे समझे बिना धर्म अपना सबसे बड़ा प्रयोजन खो देता है — धर्म का उद्देश्य है भयमुक्त समाज। यदि धर्म भय पैदा करे, डर सिखाए, या मनुष्य को मनुष्य से डरने की आदत डाले, तो वह अपने ही मूल से कट जाता है। धर्म का जन्म भय से नहीं, बल्कि भय से मुक्ति के लिए हुआ है। जहाँ भय है, वहाँ विवेक सिकुड़ता है; जहाँ विवेक सिकुड़ता है, वहाँ करुणा सूखती है; और जहाँ करुणा सूखती है, वहाँ समाज टूटता है।

भय कई रूपों में आता है — दंड का भय, परलोक का भय, सत्ता का भय, बहिष्कार का भय, और सबसे सूक्ष्म भय: अस्वीकार होने का भय। जब समाज भय पर चलता है, तब लोग सत्य नहीं बोलते, न्याय नहीं करते, और करुणा नहीं दिखाते; वे केवल बचाव में जीते हैं। सनातन दृष्टि में धर्म का काम यह नहीं कि मनुष्य को नियंत्रित करे, बल्कि यह है कि मनुष्य को आंतरिक रूप से स्वतंत्र करे। आंतरिक स्वतंत्रता आते ही भय अपने आप ढीला पड़ जाता है।

भयमुक्त समाज का अर्थ अराजकता नहीं है। यह गलतफहमी अक्सर पैदा की जाती है। भयमुक्त समाज वह है जहाँ मर्यादा डर से नहीं, बोध से आती है। जहाँ लोग इसलिए सही कर्म नहीं करते कि कोई देख रहा है, बल्कि इसलिए करते हैं कि उनका अंतःकरण जाग्रत है। जहाँ कानून का पालन डर से नहीं, जिम्मेदारी से होता है। यही जिम्मेदारी धर्म का वास्तविक फल है।

धर्म जब भय का सहारा लेता है, तब वह अल्पकालिक अनुशासन तो ला सकता है, पर दीर्घकालिक सदाचार नहीं। भय से रोका गया कर्म अवसर मिलते ही टूट जाता है। पर समझ से चुना गया कर्म स्थायी होता है। इसलिए ऋषियों ने उपदेश से अधिक अनुभव पर बल दिया। उन्होंने कहा — जानो, देखो, समझो। क्योंकि जो समझ से उपजता है, वही भयमुक्त होता है।

भयमुक्त समाज की नींव सत्य और करुणा पर टिकी होती है। सत्य भय हटाता है, क्योंकि झूठ ही भय को जन्म देता है। करुणा भय हटाती है, क्योंकि जहाँ करुणा है, वहाँ शत्रुता टिक नहीं सकती। जब मनुष्य जानता है कि वह सुना जाएगा, समझा जाएगा, और न्याय के साथ देखा जाएगा, तब वह छिपता नहीं। छिपना ही भय का पहला संकेत है।

धर्म का उद्देश्य यह भी है कि व्यक्ति अपने भीतर के भय को पहचान ले — असफलता का भय, तुलना का भय, अकेले पड़ जाने का भय। जब धर्म व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है, तब बाहरी भय अपना प्रभाव खो देते हैं। ऐसा व्यक्ति भीड़ में भी स्वयं रहता है और अकेले में भी स्थिर। यह स्थिरता समाज में विश्वास का वातावरण बनाती है। और विश्वास के बिना कोई समाज स्वस्थ नहीं रह सकता।

भयमुक्त समाज में संवाद जीवित रहता है। प्रश्न पूछने की अनुमति होती है, मतभेद को शत्रुता नहीं माना जाता। सनातन परंपरा में प्रश्नों का स्वागत इसलिए था, क्योंकि प्रश्न भय नहीं, जिज्ञासा से जन्म लेते हैं। जहाँ जिज्ञासा है, वहाँ सीख है; जहाँ सीख है, वहाँ विकास है। भय विकास का सबसे बड़ा शत्रु है।

यह भी स्मरण रखना चाहिए कि धर्म का उद्देश्य किसी एक वर्ग को सुरक्षित करना नहीं, सभी को सुरक्षित महसूस कराना है। जब कमजोर भयमुक्त होता है, तभी समाज धर्मपूर्ण कहलाता है। यदि धर्म केवल शक्तिशाली को निर्भय बनाए और दुर्बल को भयभीत छोड़े, तो वह धर्म नहीं, विशेषाधिकार बन जाता है। सनातन का आग्रह समावेशन पर है — सबका कल्याण, सबकी सुरक्षा, सबका सम्मान।

भयमुक्त समाज में नैतिक साहस पनपता है। लोग अन्याय देखकर चुप नहीं रहते, क्योंकि उन्हें बोलने का डर नहीं होता। वे गलती स्वीकार करते हैं, क्योंकि स्वीकार करना अपमान नहीं माना जाता। वे सुधार की प्रक्रिया में भाग लेते हैं, क्योंकि दंड से पहले समझ का अवसर होता है। यही वातावरण धर्म को जीवित रखता है।

अंततः धर्म का माप यह नहीं कि कितने नियम हैं, बल्कि यह है कि कितना भय कम हुआ। यदि पूजा बढ़े और भय भी बढ़े, तो धर्म अधूरा है। यदि आडंबर घटे और साहस बढ़े, तो धर्म सही दिशा में है। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को छोटा करना नहीं, उसे खड़ा करना है — सीधे, निर्भीक और करुणामय।

इसलिए स्मरण रहे —
जहाँ भय है, वहाँ धर्म की आवश्यकता है;
और जहाँ धर्म है, वहाँ भय टिकना नहीं चाहिए।

धर्म का उद्देश्य है भयमुक्त समाज। जो इस उद्देश्य को समझ लेता है, वह धर्म का प्रचार नहीं करता — वह अपने होने से ही समाज में निर्भयता फैलाता है।

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