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महर्षि पराशर की सम्पूर्ण कथा

महर्षि पराशर की सम्पूर्ण कथा

महर्षि पराशर की सम्पूर्ण कथा

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस महामुनि की कथा सुनाने आया हूँ जिनकी वाणी से पुराणों का मेरुदंड रचा गया, जिनके ज्ञान से अवतार-तत्त्व स्पष्ट हुआ, और जिनके वंश से वह महापुरुष उत्पन्न हुए जिन्होंने वेदों को लोक में व्यवस्थित किया—आज मैं तुम्हें महर्षि पराशर की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक, एक ही प्रवाह में, बिना किसी उपशीर्षक के।

महर्षि पराशर का जन्म ब्रह्मा की महान परम्परा में हुआ, वे महर्षि पुलस्त्य के पौत्र और ऋषि शक्ति के पुत्र थे। उनके बाल्यकाल पर शोक की छाया पड़ी—क्योंकि उनके पिता का वध एक दैत्य द्वारा किया गया। इस आघात ने उनके भीतर क्रोध की ज्वाला जगा दी। पराशर ने प्रतिशोध का संकल्प लिया और दैत्यों के विनाश हेतु यज्ञ आरम्भ किया। अग्नि प्रज्वलित हुई, आहुतियाँ पड़ीं, और दैत्य-वंश काँप उठा। उसी समय ऋषि वशिष्ठ ने हस्तक्षेप किया और पराशर को रोका—कहा कि न्याय प्रतिशोध से ऊँचा होता है, और तप का शिखर क्षमा में है। पराशर का क्रोध वहीं शान्त हुआ। यह उनका पहला महान मोड़ था—जहाँ शक्ति विवेक में ढली और ज्ञान का द्वार खुला।

पराशर का तप गंगा और सरस्वती की धारा के किनारे पला-बढ़ा। उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन किया और यह समझा कि लोक को केवल मंत्र नहीं, अर्थ चाहिए; केवल कथा नहीं, सिद्धांत चाहिए। इसी भाव से उन्होंने पुराण-परम्परा को दार्शनिक स्पष्टता दी। वे विष्णु-तत्त्व के उपासक थे—संतुलन, संरक्षण और करुणा के प्रतीक। उनकी साधना शोर नहीं करती थी; वह व्यवस्था रचती थी। वे कहते थे कि धर्म वही है जो समय के साथ लोक को थामे रखे—न जड़ बनकर, न उच्छृंखल होकर।

उनका जीवन-प्रसंग भी उतना ही अर्थपूर्ण है जितना उनका ग्रंथ-कार्य। एक बार नदी-तट पर ध्यानस्थ पराशर की भेंट मत्स्यगंधा से हुई—जो आगे चलकर सत्यवती कहलाईं। इस मिलन से जन्मे कृष्ण द्वैपायन—जिन्हें संसार वेदव्यास के नाम से जानता है। पराशर ने पुत्र को केवल जन्म नहीं दिया; उन्होंने उसे दिशा दी। कहा जाता है कि उन्होंने व्यास को यह बोध कराया कि ज्ञान का दायित्व संग्रह नहीं, वितरण है। यही कारण है कि व्यास ने वेदों का विभाजन किया, महाभारत और भागवत की रचना की, और लोक को सुलभ मार्ग दिया। पराशर का पिता-धर्म गुरु-धर्म में रूपांतरित हो गया।

महर्षि पराशर का सबसे महान योगदान विष्णु पुराण है—जहाँ सृष्टि, स्थिति और लय के सूत्र स्पष्ट होते हैं; जहाँ अवतार-तत्त्व को लोक-जीवन से जोड़ा जाता है; और जहाँ भक्ति, कर्म और ज्ञान का संतुलन रचा जाता है। पराशर की भाषा सुस्पष्ट है—न अतिशयोक्ति, न भय; केवल क्रम, कारण और करुणा। वे समझाते हैं कि ईश्वर-तत्त्व किसी एक रूप में कैद नहीं, पर लोक-कल्याण के लिए रूप धारण करता है। उनका दर्शन यही कहता है कि जब अधर्म बढ़ता है, तब संरक्षण की चेतना सक्रिय होती है—और वही अवतार है।

पराशर का आश्रम शिक्षा का केंद्र था। वहाँ शिष्य प्रश्न पूछते थे, और उत्तर अनुभव से मिलते थे। वे ज्योतिष, काल-गणना और वंश-परम्परा में भी निष्णात थे। उन्होंने राजाओं को यह सिखाया कि सत्ता का उद्देश्य संरक्षण है, प्रदर्शन नहीं। उनके लिए यज्ञ सामाजिक शुद्धि का माध्यम था, और भक्ति आंतरिक अनुशासन। वे शाप देने से बचते थे; चेतावनी देते थे। उनका विश्वास था कि समय के साथ समझ गहरी होती है—यदि धैर्य रखा जाए।

जीवन के उत्तरार्ध में पराशर अधिक अंतर्मुखी हो गए। ग्रंथ-कार्य पूर्ण था, पर साधना शेष। वे नदी-तट पर ध्यान करते, जहाँ प्रवाह उन्हें स्मरण कराता कि ज्ञान भी बहना चाहिए। एक संध्या वे ध्यानस्थ बैठे—श्वास सम, मन निर्मल, और चेतना व्यापक। रात्रि की नीरवता में जैसे अर्थ स्वयं स्थिर हो गया। प्रभात तक वह स्थिरता प्रकाश में ढल गई—और महर्षि पराशर देह-सीमा से परे ब्रह्म-चेतना में विलीन हो गए, बिना किसी उद्घोष के, बिना किसी विदाई के—जैसे व्यवस्था स्वयं व्यवस्था में लौट जाए।

महर्षि पराशर का संदेश आज भी उतना ही स्पष्ट है—क्रोध को विवेक में ढालो, ज्ञान को लोकहित में बहाओ, और भक्ति को संतुलन का नाम दो। जो धर्म समय को समझकर चलता है, वही टिकता है।

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