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मौन — सनातन की सबसे गहरी और शक्तिशाली साधना

मौन — सनातन की सबसे गहरी और शक्तिशाली साधना

मौन — सनातन की सबसे गहरी साधना

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नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस साधना के बारे में बताने आया हूँ जिसे लोग कमजोरी समझ लेते हैं, पर सनातन में इसे परम शक्ति कहा गया — मौन।

आज की दुनिया शोर से भरी है। हर कोई बोल रहा है, कोई सुन नहीं रहा। हर कोई दिखा रहा है, कोई समझ नहीं रहा। सनातन ने बहुत पहले जान लिया था — सत्य शोर में नहीं, मौन में उतरता है।

ऋषि बोलकर ज्ञानी नहीं बने, वे चुप रहकर जागे। उपनिषद इसलिए “उप-निषद” कहलाए, क्योंकि वे गुरु के पास बैठकर मौन में सुने गए।

मौन का अर्थ चुप रहना नहीं है। मौन का अर्थ है — मन का शांत हो जाना। आप बोल न भी रहे हों, पर भीतर शोर है, तो मौन नहीं। और आप बोल रहे हों, पर भीतर शांति है, तो भी मौन है।

सनातन कहता है — जब मन शांत होता है, तब बुद्धि स्पष्ट होती है। और जब बुद्धि स्पष्ट होती है, तब गलत निर्णय अपने आप गिर जाते हैं।

कृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में मौन का ही उपदेश दिया। उन्होंने पहले उसे बोलने दिया, रोने दिया, डरने दिया। फिर शब्द आए। क्योंकि सही शब्द हमेशा मौन के बाद आते हैं।

आज लोग तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं, इसलिए पछताते हैं। सनातन सिखाता है — रुको, साँस लो, देखो, फिर बोलो।

मौन अहंकार को कमजोर करता है। जो व्यक्ति हर समय बोलता है, वह भीतर असुरक्षित होता है। जो मौन में सहज है, वह भीतर स्थिर होता है।

इसलिए संत कम बोलते हैं, ऋषि कम बोलते हैं, पर जब बोलते हैं — तो युग बदल देते हैं।

सनातन इसलिए गहरा है क्योंकि वह चिल्लाता नहीं, वह स्थिर रहता है। और जो स्थिर हो गया, उसे कोई हिला नहीं सकता।

लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद


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