प्रार्थना — माँग नहीं, मिलन की भाषा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस क्रिया का मर्म समझाने आया हूँ जिसे लोग अक्सर याचना समझ लेते हैं, पर सनातन में यह संवाद और मिलन है — प्रार्थना।
प्रार्थना का अर्थ सूची लेकर बैठ जाना नहीं है। ये दे दो, वो दे दो — यह व्यापार है, प्रार्थना नहीं। सनातन कहता है कि प्रार्थना वह क्षण है जब मन अपने भार उतार देता है, जब शब्द अहंकार से नहीं, समर्पण से निकलते हैं।
ऋषियों की प्रार्थनाएँ देखो। वे धन नहीं माँगते, वे दीर्घायु नहीं माँगते। वे माँगते हैं सद्बुद्धि, साहस और सत्य पर टिके रहने की शक्ति। क्योंकि जिसने सही दृष्टि पा ली, उसके लिए परिस्थितियाँ अपने आप अर्थपूर्ण हो जाती हैं।
प्रार्थना इसलिए प्रभावी होती है क्योंकि वह मन को नम्र बनाती है। और नम्र मन में विवेक सहज उतरता है। जहाँ विवेक जागता है, वहाँ निर्णय शुद्ध होते हैं और जीवन हल्का हो जाता है।
सनातन में प्रार्थना देवता बदलने से नहीं बदलती। नाम अलग हो सकते हैं, रूप अलग हो सकते हैं, पर भाव एक होता है। भाव सही है तो भाषा गौण हो जाती है।
कभी प्रार्थना मंत्र बन जाती है, कभी आँसू, कभी मौन। मौन भी प्रार्थना है, जब उसमें स्वीकार हो। जब मन यह कह दे कि जो है, वही उचित है, तब मौन सबसे गहरी प्रार्थना बन जाता है।
प्रार्थना का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि वह ईश्वर को नहीं बदलती, वह साधक को बदलती है। और जब साधक बदलता है, तो परिस्थितियाँ अपने आप बदलने लगती हैं।
सनातन इसलिए प्रार्थना को दिन में कई बार रखता है — सुबह, संध्या, रात्रि। ताकि मन बार बार अपने स्रोत की ओर लौटता रहे और भटकने से पहले ही संभल जाए।
जो प्रार्थना करता है, वह अकेला नहीं रहता। क्योंकि उसे पता है कि कहीं न कहीं कोई सुन रहा है। और जो सुन रहा है, वह बाहर नहीं, भीतर है।
सनातन में प्रार्थना माँग नहीं, मिलन है। और यह मिलन ही जीवन को अर्थ देता है।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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