समय का सम्मान — धर्म का व्यवहारिक रूप
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं उस सत्य की ओर ध्यान दिलाने आया हूँ जिसे मनुष्य सबसे अधिक अनदेखा करता है, और उसी अनदेखी में अपना जीवन खो देता है — समय का सम्मान करना भी धर्म है। धर्म केवल पूजा, व्रत, दान या मंत्रों तक सीमित नहीं है; धर्म जीवन को समझने और उसे सही ढंग से जीने की कला है। और जीवन जिस धारा पर बहता है, वह धारा समय है। जो समय का सम्मान नहीं करता, वह जीवन का सम्मान भी नहीं कर सकता।
समय किसी का शत्रु नहीं है, न ही वह किसी का मित्र है। समय साक्षी है — निष्पक्ष, निरंतर और अटल। वह सबको समान रूप से अवसर देता है, पर परिणाम उसी को देता है जो उसे पहचानता है। सनातन दृष्टि में समय को काल कहा गया है — वही काल जो सृजन भी करता है और संहार भी। काल से बड़ा कोई देव नहीं, क्योंकि देवता भी समय के भीतर कार्य करते हैं। जो समय को समझ लेता है, वह जीवन की गति को समझ लेता है।
समय का सम्मान करने का अर्थ घड़ी देखना नहीं है, बल्कि प्रत्येक क्षण की कीमत समझना है। जो क्षण बीत गया, वह लौटकर नहीं आता। धन लौट सकता है, स्वास्थ्य कुछ हद तक लौट सकता है, पर बीता हुआ समय कभी वापस नहीं आता। इसीलिए समय के प्रति असावधानी सबसे बड़ा अपव्यय है। यह केवल समय का नहीं, जीवन का अपव्यय है।
सनातन परंपरा ने कभी आलस्य को धर्म नहीं माना। यहाँ आलस्य को तमस कहा गया — अंधकार की अवस्था। जो व्यक्ति समय को टालता है, वह अपने कर्तव्य को टालता है। और जो अपने कर्तव्य को टालता है, वह धीरे-धीरे आत्मग्लानि में डूबने लगता है। समय का सम्मान मनुष्य को आत्मसम्मान देता है, क्योंकि वह जानता है कि वह अपने हिस्से का जीवन जी रहा है, उसे टाल नहीं रहा।
समय का सम्मान करना दूसरों का सम्मान करना भी है। जो व्यक्ति देर करता है, वह केवल घड़ी से नहीं, दूसरों के जीवन से समय चुराता है। किसी को प्रतीक्षा में रखना, किसी वचन को टालना, किसी कार्य को लटकाए रखना — ये सब असावधानी नहीं, अधर्म के सूक्ष्म रूप हैं। क्योंकि इनमें असंवेदनशीलता छिपी होती है। धर्म संवेदनशीलता से जन्म लेता है, और संवेदनशील व्यक्ति समय के प्रति लापरवाह नहीं हो सकता।
समय का सम्मान यह भी सिखाता है कि हर कार्य का एक उचित क्षण होता है। जो बात सही समय पर कही जाए, वह औषधि बनती है; वही बात गलत समय पर कही जाए, तो विष बन जाती है। जो निर्णय सही समय पर लिया जाए, वह जीवन बदल देता है; वही निर्णय देर से लिया जाए, तो पश्चाताप बन जाता है। विवेक समय के साथ चलता है। जो समय को नहीं समझता, वह विवेक से भी कट जाता है।
धर्म का एक अर्थ यह भी है — जो करना है, उसे टालना नहीं। जब मनुष्य जानता है कि क्या सही है, और फिर भी उसे कल पर छोड़ देता है, तब वह धर्म को कमजोर करता है। समय के साथ धर्म का पालन करने का अर्थ है — आज जो करना उचित है, उसे आज ही करना। यही कर्मयोग है।
समय का सम्मान करने वाला व्यक्ति भविष्य से डरता नहीं और अतीत में अटका नहीं रहता। वह वर्तमान में जाग्रत रहता है। वर्तमान में जाग्रत रहना ही योग है, यही ध्यान है, यही साधना है। जो व्यक्ति हर क्षण को सजगता से जीता है, उसके लिए अलग से साधना की आवश्यकता नहीं रहती — उसका जीवन ही साधना बन जाता है।
समय का अपमान करने वाला व्यक्ति अक्सर कहता है कि “अभी समय नहीं है।” पर सत्य यह है कि समय कभी नहीं रुकता; रुकता केवल मनुष्य का साहस है। समय का सम्मान साहस की माँग करता है — निर्णय लेने का साहस, परिश्रम करने का साहस, और अपने भीतर झाँकने का साहस। जो इस साहस को जुटा लेता है, समय स्वयं उसका सहयोगी बन जाता है।
सनातन दृष्टि में जीवन क्षणभंगुर है, इसलिए मूल्यवान है। मृत्यु का बोध हमें डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है। यह बोध कहता है — जो करना है, अभी करो; जो बनना है, अभी बनो; जो कहना है, अभी कहो। यही समय का सम्मान है, और यही धर्म का व्यवहारिक रूप है।
अंततः धर्म किसी ग्रंथ में बंद नियम नहीं, बल्कि समय के साथ निभाई गई जिम्मेदारी है। जो व्यक्ति समय का सम्मान करता है, वह अपने जीवन, अपने कर्म और अपने संबंधों का सम्मान करता है। और जो इनका सम्मान करता है, वही वास्तव में धर्म के मार्ग पर चलता है।
इसलिए स्मरण रहे — समय को टालना जीवन को टालना है। समय को समझना जीवन को समझना है। और समय का सम्मान करना भी धर्म है।
जो इस सत्य को जी लेता है, उसके लिए हर क्षण अर्थ से भर जाता है; और जिसका हर क्षण अर्थपूर्ण हो जाए, उसके जीवन में अधर्म टिक नहीं सकता।
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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