ध्यान — जब मन रुकता है और सत्य बोलने लगता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस साधना के बारे में बताने आया हूँ जिसे लोग तकनीक समझ लेते हैं, पर सनातन में यह अवस्था है — ध्यान।
ध्यान कोई क्रिया नहीं है। ध्यान एक स्थिति है, जिसमें तुम कुछ कर नहीं रहे होते, बल्कि हो रहे होते हो।
सनातन ऋषियों ने ध्यान इसलिए नहीं किया कि कोई सिद्धि मिले, बल्कि इसलिए कि मन की धूल बैठ जाए।
मन जब लगातार दौड़ता है, तो सत्य दिखता नहीं। जैसे हिलते हुए पानी में प्रतिबिंब स्पष्ट नहीं होता।
ध्यान का पहला चरण शांति नहीं होता, बल्कि अस्वस्थता होती है। क्योंकि जब तुम बैठते हो, तो भीतर का शोर सामने आ जाता है।
अधिकांश लोग यहीं रुक जाते हैं। वे कहते हैं कि ध्यान उनके लिए नहीं है। लेकिन ऋषि कहते हैं — यही तो शुरुआत है।
ध्यान का अर्थ विचारों को मारना नहीं है। ध्यान का अर्थ है विचारों को देखना। जो देखा गया, उसका प्रभाव अपने आप कम होने लगता है।
धीरे-धीरे विचार विराम लेने लगते हैं। बीच-बीच में खामोशी उतरती है।
और उस खामोशी में कोई आवाज़ नहीं होती, लेकिन स्पष्टता होती है।
यहीं से अहंकार ढीला पड़ता है, डर कमजोर होता है और विवेक जागने लगता है।
ध्यान तुम्हें संसार से भागना नहीं सिखाता। ध्यान तुम्हें संसार में स्थिर रहना सिखाता है।
इसीलिए राजा भी ध्यान करते थे, योद्धा भी और गृहस्थ भी।
ध्यान किसी गुफा की बपौती नहीं है। यह हर उस मनुष्य का अधिकार है जो सच में जागना चाहता है।
सनातन कहता है कि जो ध्यान में उतर गया, उसे किसी उपदेश की ज़रूरत नहीं रहती, क्योंकि सत्य उसे भीतर से बोलने लगता है।
और जब भीतर का सत्य जागता है, तो बाहर की दुनिया धीरे-धीरे अपनी सही जगह पर आ जाती है।
🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला
लेखक / Writer : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन / Publish By : सनातन संवाद
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