भीष्म ने शिखंडी के सामने शस्त्र क्यों छोड़ दिए?
— वह युद्ध, जो बल से नहीं, वचन से जीता गया
कुरुक्षेत्र का दसवाँ दिन। युद्ध अपने चरम पर था, पर उसका केंद्र कोई और नहीं— भीष्म थे।
जिस दिशा में भीष्म का रथ मुड़ता, उस दिशा में मृत्यु निश्चित हो जाती। पांडवों की सेना टूट रही थी, और अर्जुन स्वयं असमंजस में था।
भीष्म अजेय थे। न उन्हें कोई परास्त कर सकता था, न कोई मार सकता था— जब तक वे स्वयं न चाहें।
कृष्ण का समाधान: युद्ध नहीं, स्मृति
तभी श्रीकृष्ण ने वह मार्ग चुना जो अस्त्र से नहीं, अतीत की स्मृति से होकर जाता था।
उन्होंने अर्जुन से कहा— “भीष्म को शस्त्र से नहीं, उनके वचन से पराजित करो।”
और उसी क्षण रणभूमि में आया शिखंडी।
शिखंडी: एक योद्धा या स्मृति?
शिखंडी कोई साधारण योद्धा नहीं था। वह अम्बा की स्मृति था— वह स्त्री, जिसका जीवन भीष्म की प्रतिज्ञा की भेंट चढ़ गया था।
भीष्म ने अम्बा का अपमान नहीं किया था, पर उसके जीवन की दिशा बदल दी थी। और अम्बा ने उसी क्षण प्रतिज्ञा ली थी—
“मैं तुम्हारे पतन का कारण बनूँगी।”
शिखंडी उसी प्रतिज्ञा का फल था।
वह क्षण, जब भीष्म ने धनुष नीचे रखा
रणभूमि में अर्जुन के रथ के आगे शिखंडी था। और उसके पीछे— अर्जुन।
भीष्म ने देखा। वे सब समझ गए।
शिखंडी को देखकर भीष्म के हाथों में शस्त्र काँप गए— बल के कारण नहीं, वचन के कारण।
भीष्म जानते थे— शिखंडी स्त्री-भाव से उत्पन्न है। और उन्होंने जीवनभर यह प्रतिज्ञा निभाई थी कि वे किसी स्त्री पर शस्त्र नहीं उठाएँगे।
यहाँ भीष्म हारे नहीं—उन्होंने स्वयं को रोका
यह युद्ध की हार नहीं थी। यह धर्म की सीमा थी।
भीष्म चाहते तो अर्जुन को मार सकते थे। शिखंडी को कुचल सकते थे।
पर तब वे भीष्म नहीं रहते।
उन्होंने धनुष नीचे रखा। और उसी क्षण अर्जुन के बाणों की वर्षा हुई।
भीष्म का पतन और सबसे बड़ा उपदेश
जब भीष्म शरशय्या पर गिरे, तो उन्होंने कोई पश्चाताप नहीं किया।
उनके चेहरे पर शांति थी।
क्योंकि उन्होंने युद्ध नहीं छोड़ा था— उन्होंने अपने वचन की रक्षा की थी।
कृष्ण का मौन और धर्म का अर्थ
कृष्ण ने उस दिन कोई शंख नहीं फूंका। कोई उपदेश नहीं दिया।
क्योंकि भीष्म स्वयं उपदेश बन चुके थे।
निष्कर्ष
भीष्म की पराजय शक्ति से नहीं हुई। रणनीति से भी नहीं।
वह पराजय थी— वचन के सामने बल की।
महाभारत हमें सिखाता है—
“जिसने अपने सिद्धांतों को संकट में भी नहीं छोड़ा, वह कभी पराजित नहीं होता— चाहे वह रणभूमि में गिर ही क्यों न जाए।”
भीष्म गिरे थे। पर धर्म खड़ा रहा।
सनातनी मर्म
"भीष्म का चरित्र हमें 'Inflexible Integrity' (अडिग सत्यनिष्ठा) का पाठ पढ़ाता है। शिखंडी के सामने शस्त्र छोड़ना भीष्म की कमजोरी नहीं, उनकी सर्वोच्च शक्ति थी। उन्होंने सिद्ध किया कि मृत्यु स्वीकार्य है, पर अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं। आज के प्रतिस्पर्धी युग में भीष्म हमें सिखाते हैं कि जीत केवल वही सार्थक है जो आपके सिद्धांतों की नींव पर खड़ी हो।"
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