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👉 Click Hereयह कथा उस भक्ति की है जो शब्दों में नहीं, सहनशीलता में प्रकट होती है—जहाँ शिकायत नहीं होती, केवल भरोसा होता है।
एक गाँव के बाहर, खेतों के बीच एक युवा ग्वाला रहता था। दिन भर वह गायों को चराता, वर्षा में भीगता, धूप में जलता, और रात को थका-हारा अपनी झोंपड़ी में लौट आता। उसके पास पूजा का कोई बड़ा साधन नहीं था—न घंटी, न धूप, न शास्त्र। बस एक आदत थी: रात को सोने से पहले वह आकाश की ओर देखकर धीरे से कहता, “आज भी संभाल लिया… कल भी संभाल लेना।”
लोग कहते थे, “यह कैसी प्रार्थना है?” वह मुस्कुराकर कहता, “जो साथ चलता है, उसे औपचारिक बुलावे की ज़रूरत नहीं होती।”
एक वर्ष भयंकर वर्षा हुई। नदी उफन पड़ी, खेत डूब गए, रास्ते बह गए। उस रात ग्वाला अपनी गायों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने निकला। अँधेरा घना था, बारिश तेज़ थी, और रास्ता फिसलन भरा। कई बार वह फिसला, गिरा, उठा—पर शिकायत एक बार भी उसके होंठों पर नहीं आई। बस वही वाक्य मन में गूँजता रहा—“संभाल लेना।”
रात गहरी हो गई। अचानक एक छोटी बछिया बहाव की ओर फिसल गई। ग्वाला उसे बचाने दौड़ा, पर स्वयं भी नदी की धार में जा गिरा। ठंडे पानी ने शरीर जकड़ लिया। साँस टूटने लगी। उस क्षण उसने कुछ माँगा नहीं। बस मन ही मन कहा—“अब भी… संभाल लेना।”
अगले ही पल उसे लगा जैसे किसी ने उसे कंधे पर उठा लिया हो। पानी का दबाव कम हुआ, ठंड पीछे छूट गई। आँखें खुलीं तो उसने देखा—एक किशोर, साँवला, गीले केश, बांसुरी कमर में खोंसी हुई। बिना कुछ कहे वह ग्वाले को किनारे तक ले आया। बछिया भी सुरक्षित थी, जैसे पहले से ही वहाँ रख दी गई हो।
ग्वाला काँपते स्वर में बोला, “आप…?”
किशोर मुस्कुराया। उस मुस्कान में वही अपनापन था, जो हर रात आकाश की ओर देखते समय महसूस होता था। उसने कहा, “जब तुम रोज़ कहते हो ‘संभाल लेना’, तो मैं जिम्मेदारी ले लेता हूँ।”
ग्वाला की आँखों से आँसू बह निकले। वह समझ गया—यह कोई और नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण थे। उसने हाथ जोड़कर कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं मिले।
कृष्ण ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “भक्ति वह नहीं जो माँग करे, भक्ति वह है जो भरोसा करे। तुमने कभी सवाल नहीं किया—इसीलिए मैं उत्तर बनकर आया।”
कहते हैं, उस रात के बाद ग्वाले का जीवन नहीं बदला—वह वैसा ही रहा। वही खेत, वही गायें, वही साधारण दिन। पर एक फर्क था। अब जब वह रात को आकाश की ओर देखता और कहता, “संभाल लेना,” तो उसके चेहरे पर डर नहीं, निश्चिंतता होती थी। क्योंकि जिसने एक बार अपने आप को सौंप दिया हो, उसके लिए भविष्य भी प्रभु की देखरेख में आ जाता है।
यकीन मानिए, जब तक आप पतवार (Oar) खुद पकड़े हुए हैं, ईश्वर केवल साक्षी हैं; जिस क्षण आप पतवार उन्हें सौंप देते हैं, वे 'मल्लाह' बन जाते हैं।
सनातन संवाद
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