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भक्त कण्णप्पा: जब एक शिकारी के अटूट प्रेम के आगे शिव के शास्त्र भी नतमस्तक हो गए

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भक्त कण्णप्पा: जब शिकारी के प्रेम के आगे शिव के शास्त्र नतमस्तक हुए | Sanatan Sanvad

भक्त कण्णप्पा: जब एक शिकारी के अटूट प्रेम के आगे शिव के शास्त्र भी नतमस्तक हो गए

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें वह कथा सुनाने आया हूँ जहाँ विधि–विधान नहीं, शास्त्र–ज्ञान नहीं, बल्कि हृदय की निष्कपट भक्ति स्वयं भगवान तक पहुँच गई। यह कथा है कण्णप्पा की—एक वनवासी शिकारी की, जिसने प्रेम से वह कर दिखाया जो बड़े-बड़े योगी भी नहीं कर पाते, और यह कथा है भगवान शिव की करुणा की, जो नियमों से नहीं, निष्ठा से प्रसन्न होते हैं।

बहुत प्राचीन समय में एक वनवासी युवक था—नाम तिन्नन। शिकार उसका जीवन था, वन उसका घर। उसे न वेद ज्ञात थे, न पूजा की विधि। एक दिन वन में घूमते हुए वह एक निर्जन स्थान पर स्थित शिवलिंग के पास पहुँचा। वहाँ किसी ने विधिवत पूजा नहीं की थी, पर तिन्नन के भीतर कुछ जागा। उसने सोचा—यदि यह देवता हैं, तो इन्हें भी भोजन चाहिए। वह शिकार का मांस लाया, अपने मुख से चखकर श्रेष्ठ टुकड़े चुने और शिवलिंग के सामने रख दिए। जल के लिए उसने अपने मुख से जल लाकर अर्पित किया। शास्त्रों की दृष्टि से यह सब “अशुद्ध” था, पर हृदय की दृष्टि से यह निष्कपट था।

आकाश में बैठे देवताओं को यह दृश्य विचलित करने लगा। वे बोले—यह कैसी पूजा? तब शिव मुस्कराए। उन्होंने परीक्षा लेने का निश्चय किया। एक दिन तिन्नन आया तो उसने देखा कि शिवलिंग से रक्त बह रहा है—मानो नेत्र घायल हो। तिन्नन व्याकुल हो उठा। उसने बिना सोचे अपने तीर की नोक से अपनी आँख निकाल ली और शिवलिंग पर लगा दी—रक्त थम गया। थोड़ी देर में दूसरा नेत्र भी रक्तस्राव करने लगा। तिन्नन ने दूसरी आँख निकालने का निश्चय किया। पर उसे चिंता हुई—दूसरी आँख रखने का स्थान कैसे जानूँगा? उसने अपने पैर का अंगूठा शिवलिंग पर रख दिया, ताकि लक्ष्य बना रहे।

जैसे ही उसने दूसरी आँख निकालने को हाथ बढ़ाया, उसी क्षण शिव प्रकट हो गए। उन्होंने तिन्नन का हाथ पकड़ लिया और कहा—“रुको।” करुणा से भरे स्वर में उन्होंने कहा कि तुम्हारी भक्ति पूर्ण है। उन्होंने तिन्नन को दिव्य नेत्र प्रदान किए और उसे अपने गणों में स्थान दिया। उसी क्षण तिन्नन कण्णप्पा कहलाए—नेत्र अर्पित करने वाले महान भक्त।

यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर को पाने का मार्ग केवल मंत्रों से नहीं, समर्पण से खुलता है। नियम आवश्यक हैं, पर वे प्रेम के ऊपर नहीं। जब हृदय सच्चा हो, तो शिकार का मांस भी नैवेद्य बन जाता है, और जब निष्ठा अडिग हो, तो देह का अंग भी पुष्प बन जाता है। कण्णप्पा ने दिखाया कि भक्ति का शिखर वही है जहाँ ‘मैं’ शेष नहीं रहता—केवल ‘तू’ रह जाता है।

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