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एकलव्य की कथा: जब प्रतिभा ने गुरु स्वयं चुना | सनातन संवाद

एकलव्य की कथा: जब प्रतिभा ने गुरु स्वयं चुना | सनातन संवाद

एकलव्य की कथा: जब प्रतिभा ने गुरु स्वयं चुना

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं तुम्हें वह कथा सुनाने आया हूँ जहाँ प्रतिभा ने गुरु को स्वयं चुन लिया, और त्याग ने इतिहास में अमिट छाप छोड़ दी—यह कथा है एकलव्य की। यह प्रसंग बताता है कि साधना यदि निष्कपट हो, तो बिना औपचारिक दीक्षा के भी ज्ञान उतर आता है; और धर्म की कसौटी पर सबसे कठिन प्रश्न तब आते हैं, जब उत्तर स्वयं को अर्पित करना हो।

बहुत प्राचीन समय में निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य वन में रहता था। उसके भीतर धनुर्विद्या के प्रति प्रबल आकर्षण था। उसने गुरु के रूप में द्रोणाचार्य को चुना और उनके आश्रम पहुँचा, पर जाति और परंपरा के कारण उसे शिष्य स्वीकार नहीं किया गया। एकलव्य ने विरोध नहीं किया। उसने वन में लौटकर मिट्टी से द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाई, उसे ही गुरु मानकर प्रणाम किया और उसी के सामने कठोर अभ्यास में लग गया। उसका अभ्यास इतना एकाग्र था कि वन की निस्तब्धता भी उसके तीरों की गति से थम-सी जाती।

समय बीतता गया। एक दिन कौरव–पाण्डवों के साथ द्रोणाचार्य वन में पहुँचे। वहाँ एक कुत्ते ने भौंकना शुरू किया और अगले ही क्षण उसके मुख में सात तीर ऐसे गड़े कि वह न घायल हुआ, न मरा—केवल वाणी थम गई। यह अद्भुत कौशल देखकर द्रोणाचार्य चकित हुए। उन्होंने उस धनुर्धर को बुलाया। एकलव्य विनय से आया और बोला—“मैं आपका शिष्य हूँ।” द्रोणाचार्य ने पूछा—“दीक्षा कहाँ?” एकलव्य ने अपनी प्रतिमा की ओर संकेत किया—“यहीं।”

द्रोणाचार्य समझ गए कि यह कौशल यदि आगे बढ़ा तो उनके प्रिय शिष्य अर्जुन की प्रतिज्ञा—‘श्रेष्ठ धनुर्धर’—डगमगा सकती है। गुरु ने दक्षिणा माँगी। एकलव्य ने बिना प्रश्न किए कहा—“आज्ञा दीजिए।” दक्षिणा थी—दाहिना अंगूठा। एकलव्य ने क्षणभर भी नहीं सोचा। उसने अपने ही हाथ से अंगूठा काटकर गुरु के चरणों में रख दिया। रक्त बहा, पर चेहरे पर ग्लानि नहीं—क्योंकि उसने गुरु-वचन को धर्म माना।

अंगूठा गया, पर साधना नहीं गई। एकलव्य ने बाएँ हाथ से अभ्यास जारी रखा। इतिहास ने उसे सिंहासन नहीं दिया, पर उसे वह स्थान दिया जहाँ त्याग चमकता है। उसकी कथा यह सिखाती है कि योग्यता को पहचानने के साथ-साथ समाज की संरचनाएँ भी प्रश्नों के घेरे में आती हैं; और यह भी कि जब शिष्य अपने अहंकार का अंगूठा अर्पित कर देता है, तब विद्या का भार हल्का हो जाता है—पर पीड़ा समाज की स्मृति बन जाती है।

यह प्रसंग हमें यह समझाता है कि गुरु-शिष्य परंपरा केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी है; और साधना केवल परिणाम नहीं, प्रक्रिया है। एकलव्य की विजय तीरों में नहीं, त्याग में थी—और यही कारण है कि वह आज भी विवेक की अदालत में खड़ा प्रश्न है।


स्रोत / संदर्भ
यह कथा महाभारत (आदिपर्व—एकलव्य प्रसंग) में वर्णित है।

लेखक : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन : सनातन संवाद

Copyright Disclaimer : यह कथा सनातन धर्म के प्रमाणिक ग्रंथों पर आधारित है। बिना अनुमति पुनर्प्रकाशन वर्जित है।

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