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सत्यमेव जयते — धर्म का मूल सूत्र

सत्यमेव जयते — धर्म का मूल सूत्र | सनातन संवाद

सत्यमेव जयते — धर्म का मूल सूत्र

नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।

आज मैं उस मूल सूत्र को स्मरण कराने आया हूँ जिस पर धर्म की पूरी इमारत खड़ी है — धर्म का मूल है — “सत्यमेव जयते।” यह कोई नारा नहीं, कोई राजनीतिक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत नियम है। सत्य की विजय कोई घटना नहीं, एक प्रक्रिया है। वह तुरंत दिखे या न दिखे, पर अंततः वही स्थिर रहता है। असत्य शोर करता है, सत्य मौन में टिकता है।

सत्य का अर्थ केवल सच बोल देना नहीं है। सत्य का अर्थ है — जैसा है, वैसा होना। विचार में, वाणी में और कर्म में एकरूपता। जब मनुष्य भीतर कुछ और सोचता है, बाहर कुछ और बोलता है, और करता कुछ और है — वहीं से अधर्म शुरू होता है। सत्य इन तीनों को एक धागे में पिरो देता है। यही धागा चरित्र कहलाता है। और चरित्र ही धर्म का दृश्य रूप है।

“सत्यमेव जयते” का अर्थ यह नहीं कि सत्य बोलने वाला हमेशा तुरंत जीत जाता है। कई बार सत्य अकेला पड़ता है, उपेक्षित होता है, दबाया जाता है। पर असत्य को जितना भी सहारा दे दिया जाए, वह भीतर से खोखला रहता है। समय उसका भार सह नहीं पाता। सत्य धीरे चलता है, पर गहराई में चलता है। और जो गहराई में चलता है, वही टिकता है।

सनातन दृष्टि में सत्य इसलिए सर्वोच्च है क्योंकि वही निर्भय बनाता है। असत्य भय पैदा करता है — पकड़े जाने का भय, खो जाने का भय, टूट जाने का भय। सत्य में ऐसा कोई भय नहीं। सत्य बोलने वाले को कुछ छुपाना नहीं पड़ता, कुछ याद नहीं रखना पड़ता। उसका मन हल्का रहता है। यही हल्कापन आत्मा को उँचा उठाता है।

सत्य केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, सामाजिक आधार भी है। जहाँ समाज सत्य से चलता है, वहाँ विश्वास रहता है। और जहाँ विश्वास है, वहाँ व्यवस्था बिना कठोर नियंत्रण के भी चल जाती है। पर जहाँ असत्य सामान्य हो जाए, वहाँ कानून बढ़ते जाते हैं, दंड बढ़ते जाते हैं, और फिर भी व्यवस्था ढहती जाती है। सत्य समाज को भीतर से जोड़ता है, असत्य उसे भीतर से खाता है।

“सत्यमेव जयते” हमें यह भी सिखाता है कि सत्य और करुणा अलग नहीं हैं। सत्य बिना करुणा के कठोर हो सकता है, पर करुणा बिना सत्य के भ्रम बन जाती है। सनातन धर्म ने सत्य को करुणा के साथ रखा, इसलिए उसे मानवता का आधार बनाया। जो सत्य दूसरों को कुचल दे, वह सत्य नहीं, अहंकार है। और जो करुणा असत्य को पाल ले, वह करुणा नहीं, कमजोरी है।

सत्य का पालन सरल नहीं है। इसके लिए साहस चाहिए। सत्य कई बार लाभ के विरुद्ध जाता है, सुविधा के विरुद्ध जाता है, भीड़ के विरुद्ध जाता है। पर जो व्यक्ति सत्य के साथ खड़ा हो जाता है, वह अकेला होकर भी भीतर से पूर्ण होता है। यही पूर्णता उसकी असली विजय है। क्योंकि असली हार बाहर की नहीं, भीतर की होती है।

सनातन परंपरा ने सत्य को व्रत बनाया, इसलिए नहीं कि लोग डरें, बल्कि इसलिए कि लोग जागें। सत्य का व्रत मनुष्य को सजग रखता है। वह हर कर्म से पहले पूछता है — क्या यह सही है? क्या यह न्यायपूर्ण है? क्या यह किसी को अनावश्यक कष्ट तो नहीं देगा? यही प्रश्न धर्म को जीवित रखते हैं।

आज के समय में असत्य तेज़ लगता है, क्योंकि वह त्वरित परिणाम देता है। पर त्वरित परिणाम स्थायी नहीं होते। सत्य धीमा लगता है, पर उसकी जड़ें गहरी होती हैं। जो समाज सत्य को छोड़ देता है, वह कुछ समय चमक सकता है, पर भीतर से खोखला हो जाता है। और जो समाज सत्य को थामे रहता है, वह संघर्षों के बाद भी टिक जाता है।

अंततः “सत्यमेव जयते” कोई आश्वासन नहीं, जिम्मेदारी है। यह कहता है — यदि सत्य की विजय चाहते हो, तो पहले स्वयं सत्य बनो। सत्य बोलो नहीं, सत्य जियो। सत्य का समर्थन भाषणों से नहीं, आचरण से होता है।

इसलिए स्मरण रहे —
सत्य कभी हारता नहीं, केवल प्रतीक्षा करता है।
असत्य कभी जीतता नहीं, केवल शोर करता है।
और धर्म का मूल है — “सत्यमेव जयते।”

जो इस मूल को थाम लेता है,
उसके लिए धर्म कोई बोझ नहीं रहता;
उसका जीवन ही सत्य की साक्षी बन जाता है।

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