कच और देवयानी की कथा: संजीवनी विद्या और धर्म की मर्यादा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस कथा के भीतर ले चलना चाहता हूँ जहाँ प्रेम ने विद्या को परखा, जहाँ सेवा ने मृत्यु को हराया, और जहाँ धर्म ने वह सीमा रेखा खींची जिसे लाँघना ज्ञान होते हुए भी अधर्म होता। यह कथा है कच और देवयानी की—पर उससे भी अधिक यह कथा है संजीवनी विद्या की, और उस मूल्य की, जो किसी मंत्र से कहीं बड़ा होता है।
यह वह समय था जब देवताओं और असुरों के बीच संघर्ष थमता नहीं था। युद्ध होते थे, सेनाएँ गिरती थीं, पर परिणाम एकतरफा रहता था, क्योंकि असुरों के गुरु शुक्राचार्य मृतसंजीवनी विद्या जानते थे—वह दिव्य मंत्र, जिसके उच्चारण से मरा हुआ भी फिर उठ खड़ा होता था। असुर युद्ध में गिरते, और कुछ ही समय में फिर रणभूमि में लौट आते। देवताओं के लिए यह असंतुलन था। देवगुरु बृहस्पति समझ गए कि यह केवल युद्ध का प्रश्न नहीं, सृष्टि के संतुलन का प्रश्न है। तब उन्होंने अपने पुत्र कच को बुलाया और एक ऐसा आदेश दिया, जिसमें पिता का स्नेह नहीं, गुरु का दायित्व था—“तुम शुक्राचार्य के आश्रम जाओ, सेवा करो, और पात्र बनकर संजीवनी विद्या प्राप्त करो।”
कच जानता था कि यह मार्ग सरल नहीं होगा। उसने न अपना वैर बताया, न उद्देश्य का उद्घोष किया। वह ब्रह्मचारी के रूप में शुक्राचार्य के आश्रम पहुँचा और स्वयं को बृहस्पति का पुत्र बताते हुए एक सहस्र वर्षों तक शिष्यत्व माँगा। शुक्राचार्य ने उसे स्वीकार किया। यहीं से कथा का वास्तविक तप आरंभ होता है। कच ने विद्या माँगी नहीं—उसने सेवा की। गौओं की रक्षा, आश्रम का कार्य, गुरु की आज्ञा—वर्षों तक यही उसका जीवन रहा। उसी आश्रम में शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी रहती थीं। उन्होंने कच के शील, संयम और मौन तप को देखा। यह प्रेम आकस्मिक नहीं था; यह उस व्यक्ति के प्रति था, जो लोभ से नहीं, विनय से जीता था।
पर जहाँ देवताओं की योजना होती है, वहाँ असुरों की शंका भी जन्म लेती है। असुरों को ज्ञात हो गया कि कच देवगुरु का पुत्र है। उन्होंने अवसर खोजा। एक दिन कच को जंगल में अकेला पाकर असुरों ने उसे मार डाला, उसके शरीर के टुकड़े किए और पशुओं को खिला दिया। जब कच न लौटा, देवयानी का हृदय काँप उठा। उसने पिता से आग्रह किया। पुत्री की पीड़ा ने गुरु को विचलित किया, और उन्होंने संजीवनी मंत्र का प्रयोग किया। कच जीवित होकर लौटा—मानो मृत्यु को पहली बार पराजित किया हो।
पर यह अंत नहीं था। कुछ समय बाद फिर अवसर आया। असुरों ने कच को पुनः मार डाला, इस बार उसके शरीर को भस्म कर दिया। भस्म को मदिरा में मिलाकर उन्होंने स्वयं शुक्राचार्य को पिला दिया। अब संकट गहरा था। कच कहीं नहीं था, और देवयानी का धैर्य टूट रहा था। जब उसने पिता से पुनः आग्रह किया, तब शुक्राचार्य ने सत्य कहा—कच उनके उदर में है। यदि उसे जीवित किया गया, तो गुरु का प्राण जाएगा। यह वह क्षण था जहाँ विद्या, प्रेम और धर्म आमने-सामने खड़े थे।
देवयानी ने पिता और प्रेम—दोनों को खोने से इनकार किया। तब शुक्राचार्य ने एक ऐसा निर्णय लिया, जो गुरु-परंपरा में अद्वितीय है। उन्होंने अपने उदर में स्थित कच को संजीवनी विद्या सिखाई। यह विद्या अब लोभ से नहीं, प्राण-दान की सीमा पर दी गई थी। कच ने विद्या सीखी, फिर मंत्रोच्चार हुआ। कच गुरु के शरीर को चीरता हुआ बाहर आया, और शुक्राचार्य का देहांत हुआ। उसी क्षण कच ने संजीवनी मंत्र का प्रयोग कर अपने गुरु को पुनर्जीवित किया। उस दिन विद्या ने सिद्ध कर दिया कि वह केवल मंत्र नहीं—मर्यादा है।
सहस्र वर्षों की अवधि पूर्ण होने पर कच विदा लेने आया। शुक्राचार्य ने उसे अनुमति दी। पर विदाई के क्षण देवयानी ने उसे रोक लिया। प्रेम अब अधिकार बनकर खड़ा था। उसने विवाह का प्रस्ताव रखा। कच ने विनय से मना किया। उसने कहा कि गुरु-पुत्री उसके लिए मातृ-तुल्य है, और गुरु-उदर से जन्म लेने के कारण वह उसे बहन के समान मानता है। यह अस्वीकार प्रेम का अपमान नहीं था—यह धर्म की रक्षा थी।
देवयानी क्रोधित हो उठीं। उन्होंने कच को श्राप दिया कि यह विद्या उसके लिए एक बार से अधिक काम नहीं करेगी। कच ने भी उत्तर दिया—क्रोध में नहीं, न्याय में—कि देवयानी का विवाह ब्राह्मण कुल में नहीं होगा। दोनों के मार्ग यहीं अलग हो गए। कच अमरावती लौट गया, जहाँ उसने संजीवनी विद्या देवताओं को सिखाई, और देवताओं का संतुलन पुनः स्थापित हुआ। देवयानी का जीवन भी आगे चला, पर वह प्रेम स्मृति बन गया।
यह कथा हमें बताती है कि विद्या यदि बल से ली जाए तो विनाश लाती है, और यदि सेवा से मिले तो सृष्टि को बचाती है। प्रेम यदि मर्यादा माँगे तो पवित्र है, और यदि अधिकार चाहे तो विष बन जाता है। कच ने बार-बार मृत्यु को स्वीकार किया, पर धर्म को नहीं छोड़ा। इसलिए संजीवनी केवल मृत को जीवित करने का मंत्र नहीं रही—वह धर्म से जुड़ी विद्या बन गई।
सनातनी मर्म:
"कच का चरित्र हमें 'Boundary of Knowledge' (ज्ञान की सीमा) का पाठ पढ़ाता है। विद्या प्राप्त करने के बाद कच के पास अहंकार का अवसर था, पर उसने 'धर्म' को चुना।"
आज के युग में यह कथा हमें सिखाती है कि हमारे 'रिश्ते' और 'इच्छाएँ' कभी भी हमारे 'नैतिक मूल्यों' से बड़े नहीं होने चाहिए। देवयानी का श्राप कच को विचलित नहीं कर पाया क्योंकि उसका उद्देश्य 'स्वयं' के लिए नहीं, बल्कि 'सृष्टि' के संतुलन के लिए था।
लेखक : तु ना रिं 🔱
प्रकाशन : सनातन संवाद

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