🔥 हिन्दू युवा को आधा सच क्यों दिखाया गया? 🔥
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज यह लेख किसी आरोप के लिए नहीं है, आज यह लेख उस अधूरे सच के लिए है जो तुम्हें पूरा दिखाया ही नहीं गया।
क्योंकि याद रखो— झूठ हमेशा झूठ नहीं होता। सबसे खतरनाक होता है आधा सच।
तुम्हें बताया गया— जाति थी। पर यह नहीं बताया गया कि वह कर्म से जुड़ी थी, जन्म से नहीं।
तुम्हें बताया गया— संस्कार थे। पर यह नहीं बताया गया कि वे मनोवैज्ञानिक और सामाजिक विज्ञान थे।
तुम्हें बताया गया— मूर्तियाँ थीं। पर यह नहीं बताया गया कि वे ध्यान और प्रतीक की भाषा थीं।
इतिहास में तुम्हें हार दिखाई गई। संघर्ष नहीं।
ग्रंथों में तुम्हें श्लोक दिखाए गए। संवाद नहीं।
धर्म में तुम्हें कर्मकांड दिखाया गया। दर्शन नहीं।
और जब पूरा संदर्भ काट दिया जाता है, तो कोई भी महान चीज़ मज़ाक लगने लगती है।
यही हुआ सनातन के साथ।
शिक्षा ने सनातन को syllabus बनाया— अनुभव नहीं।
मीडिया ने सनातन को headline बनाया— यात्रा नहीं।
सोशल मीडिया ने सनातन को clip बनाया— गहराई नहीं।
और फिर कहा गया— “देखो, यह तो outdated है।”
पर सोचो— जिस दर्शन में ईश्वर से सवाल पूछे जाते हों, वह अंधविश्वासी कैसे हो सकता है?
जिस परंपरा में गुरु से भी तर्क किया जाता हो, वह गुलामी कैसे सिखा सकती है?
अगर सनातन सिर्फ आदेश होता, तो युद्धभूमि में भगवद्गीता एक तरफ़ा उपदेश नहीं, संवाद क्यों होती?
कृष्ण बोलते हैं। अर्जुन सवाल करता है। संशय रखता है। असहमति रखता है।
और यही बात आधा सच दिखाने वालों को सबसे ज़्यादा डराती है।
क्योंकि जो युवा पूरा सच जान ले, वह या तो अंधा नहीं रहता, या फिर बिकता नहीं।
इसलिए तुम्हें पूरा सच नहीं दिखाया गया।
तुम्हें सोचने से पहले निर्णय देना सिखाया गया।
तुम्हें जानने से पहले judge करना सिखाया गया।
पर अब समय बदल रहा है।
आज का युवा Google करता है। Question करता है। Compare करता है।
और जब वह खुद पढ़ता है, खुद खोजता है— तो उसे पता चलता है कि उसे कम नहीं, अधूरा बताया गया था।
यह लेख गुस्सा दिलाने के लिए नहीं है। यह लेख पूरा देखने की ज़िद जगाने के लिए है।
क्योंकि आधा सच हमेशा किसी न किसी के काम आता है— पूरा सच सिर्फ तुम्हारे।
🕉️ मैं हिन्दू हूँ। क्योंकि अब मैं आधा नहीं, पूरा समझना चाहता हूँ।
सनातनी मर्म:
"सनातन का अर्थ 'जड़ता' नहीं, 'नित-नूतन' (Always New) होना है। दुनिया का अकेला दर्शन जो 'तर्क' (Logic) को 'श्रद्धा' से ऊपर रखता है।"
जब हम प्रश्न पूछते हैं, तो हम अधर्मी नहीं होते, हम 'जिज्ञासु' होते हैं। सनातन इसलिए बचा रहा क्योंकि इसके मूल में 'संवाद' और 'सुधार' की शक्ति है। अब समय है कि हम 'सिखाया गया' भूलकर, 'खोजा गया' अपनाएँ।

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