सहस्रकवच दानव दंबोधव और कर्ण का पूर्वजन्म
निश्चय ही महाभारत केवल एक युद्धकथा नहीं, बल्कि असंख्य सूक्ष्म कथाओं की वह महासागर है जिसमें प्रत्येक लहर अपने भीतर कोई गूढ़ रहस्य छिपाए हुए है। वेदव्यास ने जिन घटनाओं को काल, कर्म और पुनर्जन्म के सूत्र में बाँधा है, वही महाभारत को केवल ग्रंथ नहीं, बल्कि चेतना बनाता है। ऐसी ही एक कम जानी-पहचानी कथा है—सहस्रकवच दानव दंबोधव की, जो सीधे कर्ण के भाग्य से जुड़ती है और यह बताती है कि कर्म का बीज एक युग में बोया जाए तो उसका फल अगले युग में भी भोगना पड़ता है।
यह कथा द्वापर या महाभारत काल की नहीं, बल्कि त्रेतायुग से भी पूर्व की है। उस युग में दंबोधव नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर हुआ, जिसके भीतर अपार महत्वाकांक्षा थी। उसने भगवान सूर्य की कठोर आराधना की—एक वर्ष नहीं, दस नहीं, बल्कि पूरे एक सहस्र वर्षों तक। तप इतना उग्र था कि स्वयं सूर्यदेव को उसके समक्ष प्रकट होना पड़ा। प्रसन्न होकर सूर्य ने उसे वर माँगने को कहा। दंबोधव ने अमरत्व की कामना रखी, किंतु सूर्यदेव ने स्पष्ट कहा कि अमरत्व सृष्टि के विधान के विरुद्ध है, जिसे स्वयं ब्रह्मा भी नहीं बदलते।
तब दंबोधव ने अपनी बुद्धि से ऐसा वर माँगा जो अमरत्व से कम भयानक नहीं था। उसने कहा कि उसे एक-एक वर्ष की तपस्या के बदले एक दिव्य कवच प्रदान किया जाए—कुल एक हज़ार कवच। प्रत्येक कवच उसे अभेद्य बनाए, और शर्त यह हो कि जो भी उसका एक कवच तोड़े, वही तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो जाए, और वह भी ऐसा मानव हो जिसने स्वयं एक हज़ार वर्षों की तपस्या की हो। सूर्यदेव समझ गए कि यह वरदान सृष्टि के लिए घातक सिद्ध होगा, किंतु तपस्या के नियमों से बँधे होने के कारण वे उसे रोक न सके। देखते ही देखते दंबोधव सहस्रकवच बन गया।
जैसा अनुमान था, शक्ति मिलते ही उसने तीनों लोकों में उत्पात मचा दिया। देवता, ऋषि, मनुष्य—सब उसके आतंक से पीड़ित हो उठे। त्रिदेव भी विवश थे, क्योंकि सूर्यदेव के वरदान के कारण उसका वध सीधे-सीधे संभव नहीं था। सृष्टि के इस संकट को देखकर दक्षपुत्री मूर्ति, जो धर्म की पत्नी थीं, व्यथित हो उठीं। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे स्वयं उनके गर्भ से अवतरित होकर इस असुर का अंत करें। नारायण ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और कालांतर में मूर्ति से दो पुत्र उत्पन्न हुए—नर और नारायण।
उपनयन के पश्चात दोनों का मार्ग भिन्न हुआ। नारायण तप में लीन हो गए और नर ने दंबोधव को युद्ध के लिए ललकारा। असुर ने जब एक साधारण बालक को अपने सामने देखा तो उपहास किया, किंतु नर ने उसे स्पष्ट कर दिया कि उसका भाई नारायण तप कर रहा है और उसकी तपशक्ति उसे प्राप्त हो रही है। शरीर दो हैं, पर आत्मा एक। इसके बाद जो युद्ध हुआ, वह केवल अस्त्र-शस्त्र का नहीं, तप और अहंकार का भी था।
वर्षों तक युद्ध चलता रहा। जैसे ही नारायण की तपस्या के एक हज़ार वर्ष पूर्ण होते, नर दंबोधव का एक कवच तोड़ देता और वरदान की शर्त के अनुसार वह स्वयं मृत्यु को प्राप्त हो जाता। दंबोधव यह समझकर प्रसन्न होता कि उसका शत्रु नष्ट हो गया, किंतु उसे यह ज्ञात नहीं था कि यह केवल आधा सत्य है। तप पूर्ण होने पर नारायण को शिव से मृतसञ्जीवनी विद्या प्राप्त होती और वह नर को पुनः जीवित कर देता। फिर वही क्रम—एक तप करता, दूसरा युद्ध करता। इस प्रकार नौ सौ निन्यानवे कवच नष्ट हो गए और नर-नारायण नौ सौ निन्यानवे बार मृत्यु का कष्ट भोग चुके थे।
जब अंतिम कवच शेष रहा, तब दंबोधव भयभीत होकर सूर्यदेव की शरण में गया। सूर्य ने उसे अपने तेज में समाहित कर लिया। उधर नर और नारायण उसे खोजते हुए सूर्यदेव के पास पहुँचे और उससे असुर को सौंपने की माँग की। शरणागत की रक्षा के धर्म के कारण सूर्यदेव ने इनकार किया। तब नर-नारायण ने उन्हें स्मरण कराया कि उनके अविवेकपूर्ण वरदान के कारण सृष्टि और स्वयं वे दोनों कितने कष्ट भोग चुके हैं। अंततः उन्होंने सूर्य को श्राप दिया कि वही असुर अगले जन्म में उनके तेज से जन्म लेगा, जीवन भर संघर्ष करेगा, और उसके वध के लिए वे दोनों पुनः अवतार लेंगे।
उसी श्राप के फलस्वरूप द्वापर युग में दंबोधव सूर्यतेज के साथ कर्ण के रूप में जन्मा—एकमात्र शेष कवच और कुण्डल के साथ। और नर-नारायण अर्जुन और कृष्ण के रूप में अवतरित हुए। कर्ण में जहाँ सूर्य का तेज, दानवीरता और पराक्रम था, वहीं दंबोधव का अहं और अधर्म की प्रवृत्ति भी साथ आई। यही कारण है कि अपार सामर्थ्य होते हुए भी वह धर्म के पूर्ण मार्ग पर न चल सका और अंततः अर्जुन के हाथों उसका अंत हुआ।
यह कथा हमें सिखाती है कि वरदान यदि विवेक के बिना दिए जाएँ तो वे श्राप बन जाते हैं, और कर्म चाहे जितना पुराना क्यों न हो—उसका फल समय आने पर अवश्य मिलता है।
सनातनी मर्म:
"यह कथा हमें 'Cosmic Justice' (ब्रह्मांडीय न्याय) का पाठ पढ़ाती है। सहस्रकवच ने सोचा था कि वह 'शर्तों' के पीछे छिपकर मृत्यु को चकमा दे देगा, पर ईश्वर ने उसकी शर्तों को ही उसका काल बना दिया।"
कर्ण के पास जो कवच-कुंडल थे, वे वास्तव में उसके 'अहंकार का अंतिम अवशेष' थे। इंद्र द्वारा कवच माँगना कोई छल नहीं, बल्कि उस असुर की अंतिम 'सुरक्षा दीवार' को ढहाना था ताकि आत्मा मुक्त हो सके। याद रखें, 'प्रारब्ध' से कोई कवच नहीं बचा सकता।

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