मैं गर्व से कहता हूँ — मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे सीमा में रहकर सुखी रहना सिखाता है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं आपको सनातन धर्म की उस सरल लेकिन बहुत काम की सीख के बारे में बताने आया हूँ जो जीवन को उलझने नहीं देती— सीमा, यानी मर्यादा में जीना।
हम अक्सर सोचते हैं कि ज़्यादा पाने से ज़्यादा सुख मिलेगा। ज़्यादा बोलने से ज़्यादा प्रभाव पड़ेगा। ज़्यादा करने से ज़्यादा बनेंगे। लेकिन सनातन धर्म बहुत शांति से कहता है— जो ज़रूरत से ज़्यादा है, वही अक्सर परेशानी बन जाता है।
हमारे धर्म में खाने में भी संतुलन, बोलने में भी संयम, कमाने में भी मर्यादा, और चाहने में भी समझ सिखाई गई है। क्योंकि जो सीमा में रहता है, वह टूटता नहीं।
आज की दुनिया अति की ओर भाग रही है— अति काम, अति अपेक्षा, अति तुलना। और इसी अति से मन थक जाता है। सनातन धर्म हमें याद दिलाता है— कम भी बहुत होता है, अगर मन संतुष्ट हो।
सीमा का मतलब खुद को रोकना नहीं, खुद को बचाना है। जब हम जानते हैं कि कहाँ रुकना है, तभी हम सही दिशा में आगे बढ़ पाते हैं। यही मर्यादा जीवन को सुरक्षित बनाती है।
मैं तु ना रिं आपसे यही कहना चाहता हूँ— आज अपने जीवन को देखिए। कहाँ आप ज़्यादा खींच रहे हैं? कहाँ आप खुद से ज़्यादा माँग रहे हैं? थोड़ा रुकिए, थोड़ा कम कीजिए, और देखिए— मन कैसे हल्का हो जाता है।
और इसी संतुलन की वजह से मैं पूरे गर्व से कहता हूँ— “हाँ, मैं हिन्दू हूँ, क्योंकि मेरा धर्म मुझे सिखाता है कि सीमा में रहकर ही सच्चा सुख मिलता है।”

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