महर्षि वाल्मीकि की सम्पूर्ण कथा — अंधकार से प्रकाश की यात्रा
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी। आज मैं तुम्हें उस ऋषि की कथा सुनाने आया हूँ जिनका जीवन स्वयं यह प्रमाण है कि कोई भी अंधकार इतना गहरा नहीं होता कि वह प्रकाश में न बदला जा सके; जिनकी वाणी से करुणा ने काव्य का रूप लिया; और जिनके हृदय से वह महाकाव्य प्रवाहित हुआ जिसने मानवता को मर्यादा का अर्थ सिखाया—आज मैं तुम्हें महर्षि वाल्मीकि की सम्पूर्ण कथा सुनाता हूँ, जन्म से लेकर देहावसान तक।
महर्षि वाल्मीकि का जीवन साधु-आश्रम से नहीं, वन के संघर्ष से आरंभ होता है। पौराणिक परंपरा के अनुसार उनका नाम रत्नाकर था। उनका जीवन कठोर था, परिस्थितियाँ क्रूर थीं, और आजीविका का मार्ग भी उतना ही अंधकारमय। वन-पथों पर यात्रियों को लूटना, हिंसा करना—यही उनका संसार बन गया था। पर यह क्रूरता जन्मजात नहीं थी; यह जीवन की विवशता से उपजी हुई थी। भीतर कहीं करुणा का बीज दबा हुआ था, जिसे अभी जल चाहिए था। वही जल एक दिन देवर्षि नारद की वाणी बनकर आया।
जब नारद रत्नाकर के सम्मुख आए और मृत्यु का भय नहीं, बल्कि प्रश्न रखा—“जिनके लिए तुम यह पाप करते हो, क्या वे इसके फल में भी तुम्हारे साथ होंगे?”—तो यह प्रश्न किसी शास्त्र का नहीं, आत्मा का था। रत्नाकर ने अपने परिवार से पूछा। उत्तर मिला—“हम भरण-पोषण चाहते हैं, पाप का भाग नहीं।” उसी क्षण रत्नाकर के भीतर कुछ टूट गया। उन्हें पहली बार बोध हुआ कि पाप अकेले भोगा जाता है, और कर्म का भार कोई और नहीं उठाता। उन्होंने नारद के चरण पकड़ लिए। नारद ने उन्हें राम-नाम का जप दिया। पर पापों के संस्कार इतने गहरे थे कि ‘राम’ उच्चरित ही नहीं हुआ। तब नारद ने उपाय बताया—“मरा-मरा जपो।” वही ‘मरा’ कालांतर में ‘राम’ बन गया।
वर्ष बीतते गए। रत्नाकर ध्यान में स्थिर होते चले गए। देह अचल हुई, श्वास मंद हुई, और समय ने उनके शरीर पर दीमकों का ढूह खड़ा कर दिया। बाँबी—वाल्मीकि। जब वे तप से उठे, तो वे रत्नाकर नहीं रहे। वे वह हो चुके थे, जिन्हें संसार वाल्मीकि कहने लगा—अंधकार से प्रकाश की ओर चला एक जीवंत उदाहरण। यही कारण है कि कुछ परंपराएँ उन्हें वरुण-पुत्र प्रचेतस् से भी जोड़ती हैं, कुछ उन्हें ब्राह्मण कुल में जन्मा मानती हैं, और कुछ दस्यु-जीवन से निकला हुआ बताती हैं। सनातन दृष्टि में ये विरोध नहीं, बल्कि संकेत हैं—कि सत्य एक से अधिक मार्गों से प्रकट हो सकता है।
वाल्मीकि का हृदय अब इतना कोमल हो चुका था कि करुणा उनके लिए केवल भावना नहीं, स्वभाव बन गई थी। तमसा नदी के तट पर वह प्रसंग घटित हुआ जिसने इतिहास बदल दिया। एक व्याध ने क्रौंच पक्षियों के जोड़े में से एक को मार दिया। मरी हुई चिड़िया नहीं, जीवित चिड़िया का विलाप वाल्मीकि के भीतर उतर गया। उस क्षण उनके मुख से जो शब्द निकले, वे शाप नहीं थे—वे करुणा की चीख थे। वही शब्द अनुष्टुप छंद में ढले और संस्कृत का पहला श्लोक बन गए। उसी क्षण वाल्मीकि आदिकवि बने—क्योंकि काव्य का जन्म शिल्प से नहीं, करुणा से होता है।
इसके पश्चात देवर्षि नारद से उन्हें श्रीराम-कथा का सूत्र मिला और ब्रह्मा की कृपा से उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई। तब वाल्मीकि के भीतर वह कथा आकार लेने लगी, जो केवल इतिहास नहीं थी, बल्कि मानव-आचार की संहिता थी—रामायण। वाल्मीकि ने राम को देवता बनाकर नहीं लिखा; उन्होंने उन्हें मनुष्य बनाकर आदर्श रचा। उनके राम शक्ति से पहले मर्यादा चुनते हैं, अधिकार से पहले कर्तव्य। उनकी सीता त्याग की मूर्ति हैं, पर मौन सहनशीलता नहीं—आत्मसम्मान की जीवित चेतना हैं।
वाल्मीकि का जीवन रामायण से अलग नहीं चलता। जब सीता वन में आश्रय खोजती हैं, तो वाल्मीकि का आश्रम ही उन्हें शरण देता है। वहीं लव और कुश का जन्म होता है। वही आश्रम उनकी पाठशाला बनता है। आगे चलकर जब वही रामायण अयोध्या की सभा में गूँजती है, तो वह केवल काव्य नहीं रहती—वह सत्य का दर्पण बन जाती है।

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