स्वीकार — जब प्रतिरोध टूटता है और शांति उतरती है
नमस्कार, मैं तु ना रिं, एक सनातनी।
आज मैं तुम्हें उस साधना की बात बताने आया हूँ जिसे लोग हार समझ लेते हैं, पर सनातन में यह महान बुद्धि है — स्वीकार।
स्वीकार का अर्थ परिस्थितियों के आगे झुक जाना नहीं। स्वीकार का अर्थ है — जो है, उसे देख पाना बिना उससे लड़ते हुए।
जब तुम जो बदल नहीं सकता उससे लड़ते हो, तो ऊर्जा व्यर्थ जाती है। और जब तुम जो बदल सकता है उसे स्वीकार कर लेते हो, तो बुद्धि जागती है।
सनातन कहता है — दुख का आधा भाग स्थिति से नहीं, प्रतिरोध से पैदा होता है।
जो हुआ, वह हो चुका। अब प्रश्न यह नहीं कि क्यों हुआ, प्रश्न यह है — अब मैं क्या करूँ?
स्वीकार कमजोरी नहीं, यह स्पष्टता है। और स्पष्टता से ही सही कर्म जन्म लेता है।
कृष्ण ने अर्जुन को सबसे पहले यही सिखाया — स्थिति को देखो। उससे भागो नहीं। न आँसू में डूबो, न क्रोध में जलो।
जब दृष्टि साफ होती है, तो निर्णय अपने आप धर्म की ओर झुकता है।
स्वीकार का अर्थ अन्याय को मान लेना नहीं। स्वीकार का अर्थ है — अन्याय को देखकर अंधा न हो जाना।
जब मन “ऐसा नहीं होना चाहिए था” की जिद छोड़ देता है, तभी वह “अब क्या होना चाहिए” की ओर बढ़ता है।
आज लोग स्वीकार नहीं कर पाते, इसलिए अतीत में अटके रहते हैं। और जो अतीत में अटक गया, वह वर्तमान में सही कर्म नहीं कर सकता।
सनातन कहता है — जो स्वीकार कर सकता है, वही बदल सकता है। और जो बदल सकता है, वही सच में स्वतंत्र है।
✍🏻 लेखक: तु ना रिं
🌿 सनातन इतिहास ज्ञान श्रृंखला — दिन 54
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