क्या ईश्वर एक है? ऋग्वेद का सबसे क्रांतिकारी मंत्र
1. मूल संस्कृत मंत्र
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥
(ऋग्वेद - मण्डल 1, सूक्त 164, मंत्र 46)
2. शब्दार्थ
- एकं सत्: सत्य (ईश्वर) एक ही है।
- विप्रा: विद्वान/ऋषि जन।
- बहुधा वदन्ति: अनेक प्रकार से बताते या कहते हैं।
- इन्द्रं, मित्रं, वरुणम्: विभिन्न देवताओं के नाम।
3. सरल हिंदी अर्थ
परम सत्य (ईश्वर) एक ही है, जिसे विद्वान लोग अलग-अलग नामों से पुकारते हैं—जैसे इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, यम और मातरिश्वा।
4. विस्तृत व्याख्या (Deep Insights)
यह मंत्र पूरी दुनिया को ऋग्वेद की सबसे बड़ी देन है। यह भारतीय संस्कृति की 'धर्मनिरपेक्षता' और 'सहिष्णुता' का आधार है।
अनेकता में एकता: हज़ारों साल पहले ऋषियों ने यह समझ लिया था कि सत्य तक पहुँचने के रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मंजिल एक ही है।
भ्रम का अंत: लोग अक्सर भगवान के अलग-अलग रूपों को लेकर आपस में लड़ते हैं, लेकिन ऋग्वेद स्पष्ट करता है कि जैसे सूरज की किरणें अनेक हैं पर सूरज एक, वैसे ही ईश्वरीय शक्तियाँ अनेक हैं पर मूल तत्व एक ही है।
आज के जीवन में सीख: यह मंत्र हमें 'खुला दिमाग' (Open Mind) रखना सिखाता है। हमें दूसरों के विचारों और विश्वासों का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि हर कोई अपने तरीके से उसी एक सच्चाई की खोज कर रहा है।
5. आज की प्रेरणा (Conclusion)
विवादों से ऊपर उठकर एकता को देखें। जब हम यह समझ जाते हैं कि हम सब एक ही ऊर्जा से जुड़े हैं, तो द्वेष और नफरत खत्म हो जाती है।

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